Do different rules apply to nuclear weapons around the world? Learn from Iran and Israel.
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और Iran Nuclear Program को लेकर जारी बहस के बीच एक सवाल बार-बार उठता है—अगर इजरायल के पास परमाणु हथियार हैं, तो ईरान को इन्हें विकसित करने से क्यों रोका जाता है? पहली नजर में यह मामला double standard यानी दोहरे मापदंड जैसा दिख सकता है, लेकिन इसकी जड़ें दरअसल international law और वैश्विक संधियों की संरचना में छिपी हैं।
यही वजह है कि दोनों देशों पर एक जैसे नियम लागू नहीं होते, भले ही बहस राजनीतिक और नैतिक रूप से कितनी भी तीखी क्यों न हो।
अंतरराष्ट्रीय कानून में ‘सहमति’ सबसे बड़ी चीज
परमाणु हथियारों से जुड़ा अंतरराष्ट्रीय ढांचा एक बुनियादी सिद्धांत पर टिका है—state sovereignty, यानी हर देश की संप्रभुता। इसका मतलब यह है कि कोई भी देश अपने सैन्य अधिकारों या रणनीतिक क्षमता को तभी सीमित करता है, जब वह खुद किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते या संधि को स्वीकार करे।
यानी अंतरराष्ट्रीय कानून में हर नियम अपने आप सभी देशों पर लागू नहीं हो जाता। किसी देश पर वही प्रतिबंध या दायित्व लागू होते हैं, जिन्हें उसने औपचारिक रूप से मानने की सहमति दी हो। परमाणु हथियारों के मामले में यही सिद्धांत सबसे अहम है।
NPT क्या है और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
इस पूरे विवाद को समझने के लिए सबसे पहले Nuclear Non-Proliferation Treaty (NPT) को समझना जरूरी है। 1968 में बनी यह संधि दुनिया में nuclear weapons proliferation को रोकने के लिए तैयार की गई थी। इसका मकसद तीन मुख्य बातों पर आधारित है:
परमाणु हथियारों का प्रसार रोकना
परमाणु निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देना
परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को प्रोत्साहित करना
इसी वजह से NPT Treaty को आज भी वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था के सबसे अहम स्तंभों में गिना जाता है।
NPT के तहत दुनिया दो हिस्सों में बंटी
इस संधि ने दुनिया के देशों को मोटे तौर पर दो वर्गों में बांट दिया:
Nuclear Weapon States
Non-Nuclear Weapon States
NPT के अनुसार, 1 जनवरी 1967 से पहले परमाणु परीक्षण कर चुके देशों—जैसे अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन—को परमाणु हथियार संपन्न देशों की श्रेणी में रखा गया।
इसके बाद आने वाले देशों के लिए नियम अलग तय किए गए। उनसे अपेक्षा की गई कि वे परमाणु हथियार विकसित नहीं करेंगे, जबकि परमाणु शक्तियों पर यह जिम्मेदारी डाली गई कि वे ऐसी तकनीक या हथियार आगे न फैलाएं।
ईरान पर रोक क्यों है?
ईरान 1970 से NPT का सदस्य है। यही इस पूरे सवाल का सबसे सीधा जवाब है। चूंकि ईरान ने खुद को एक non-nuclear state के रूप में इस संधि के तहत बांधा है, इसलिए वह कानूनी रूप से परमाणु हथियार विकसित नहीं कर सकता।
सिर्फ इतना ही नहीं, ईरान का परमाणु कार्यक्रम International Atomic Energy Agency (IAEA) की निगरानी में भी आता है। इसका मतलब है कि उसकी परमाणु गतिविधियों की जांच और सत्यापन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कार्यक्रम का इस्तेमाल केवल peaceful nuclear use के लिए हो, न कि हथियार बनाने के लिए।
इजरायल पर वही नियम क्यों लागू नहीं होते?
यहीं पर सबसे बड़ा फर्क सामने आता है। इजरायल NPT का सदस्य नहीं है। और अंतरराष्ट्रीय कानून के मूल सिद्धांत के अनुसार, कोई भी देश उस संधि के नियमों से बाध्य नहीं होता, जिसका वह पक्षकार ही नहीं है।
इसका मतलब यह नहीं कि इजरायल पर कोई नैतिक या कूटनीतिक दबाव नहीं है, लेकिन NPT-based legal obligation उसके ऊपर उसी तरह लागू नहीं होती, जैसे ईरान पर होती है।
यही वजह है कि कानूनी रूप से दोनों देशों की स्थिति अलग दिखती है, भले ही राजनीतिक बहस में यह असमानता बहुत बड़ी क्यों न लगे।
क्या यह सिर्फ इजरायल का मामला है? नहीं
इजरायल इस श्रेणी में अकेला देश नहीं है। भारत, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देश भी NPT framework के बाहर या उससे अलग स्थिति में परमाणु क्षमता रखते हैं।
इससे यह बात और साफ होती है कि दुनिया में परमाणु हथियारों पर कोई एकसमान, सार्वभौमिक और स्वतः लागू होने वाला नियम नहीं है। जो देश किसी संधि से बंधे हैं, उनके लिए कानून अलग है; जो बाहर हैं, उनकी स्थिति अलग हो जाती है।
क्या अंतरराष्ट्रीय कानून परमाणु हथियारों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाता है?
विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत परमाणु हथियार रखने पर पूर्ण और सार्वभौमिक प्रतिबंध नहीं है। यह बात अक्सर आम बहस में नजरअंदाज हो जाती है।
हाँ, कुछ संधियाँ—जैसे NPT और 2017 Treaty on the Prohibition of Nuclear Weapons—परमाणु हथियारों को सीमित या निषिद्ध करने की कोशिश करती हैं, लेकिन वे भी केवल उन्हीं देशों पर लागू होती हैं जिन्होंने उन्हें स्वीकार किया है।
यानी अगर कोई देश इन संधियों का हिस्सा नहीं है, तो वह स्वचालित रूप से उनके सभी कानूनी दायित्वों में नहीं आता।
International Court of Justice ने क्या कहा था?
इस बहस में International Court of Justice (ICJ) की व्याख्याएं भी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। विशेषज्ञ अक्सर यह तर्क देते हैं कि अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था ने भी यह सिद्धांत मजबूत किया है कि किसी देश के सैन्य या हथियार संबंधी अधिकारों को सीमित करने के लिए वही नियम लागू किए जा सकते हैं, जिन्हें उसने स्वयं स्वीकार किया हो।
यही कारण है कि Iran vs Israel Nuclear Debate केवल सुरक्षा या राजनीति का सवाल नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह consent-based international order यानी सहमति आधारित वैश्विक व्यवस्था से जुड़ा हुआ मुद्दा है।
फिर ‘Double Standard’ की बहस क्यों होती है?
कानूनी ढांचा अपनी जगह है, लेकिन राजनीतिक और नैतिक बहस अपनी। आलोचकों का कहना है कि जब एक देश के परमाणु हथियारों को लेकर वैश्विक चिंता सीमित दिखती है, जबकि दूसरे देश के परमाणु कार्यक्रम पर बेहद सख्त प्रतिक्रिया होती है, तो यह double standard जैसा महसूस होता है।
हालांकि समर्थक यह तर्क देते हैं कि कानून की नजर से अंतर इसलिए है क्योंकि दोनों देशों की treaty status अलग है। यही वह बिंदु है जहां law, geopolitics और global power politics एक-दूसरे से टकराते दिखाई देते हैं।
सार यह है कि ईरान और इजरायल के बीच परमाणु कानून का फर्क किसी तकनीकी गलती या सीधी कानूनी विसंगति की वजह से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संधियों में शामिल होने या न होने की वजह से है।
ईरान NPT का सदस्य है, इसलिए उस पर परमाणु हथियार न विकसित करने की कानूनी बाध्यता है।
इजरायल NPT से बाहर है, इसलिए उस पर वही नियम लागू नहीं होते।
यही वजह है कि यह मामला जितना राजनीतिक और रणनीतिक है, उतना ही legal architecture of international law से भी जुड़ा हुआ है।