Rohingya Deportation पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “देश कठिन दौर से गुजर रहा है, काल्पनिक मामले मत उठाइए”

भारत में रोहिंग्या मुस्लिमों के निर्वासन को लेकर उठी बहस एक बार फिर न्यायिक कटघरे में पहुंची, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस बार याचिकाकर्ताओं को कड़ी फटकार लगाई। शुक्रवार को अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक ही मुद्दे पर बिना नए तथ्यों के बार-बार PIL दाखिल करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

क्या था मामला? बार-बार दाखिल हो रही है रोहिंग्या से जुड़ी याचिकाएं

वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस ने सुप्रीम कोर्ट के 8 मई 2024 के आदेश में संशोधन की मांग की थी, जिसमें कोर्ट ने रोहिंग्या मुस्लिमों को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था। गोंसाल्विस ने कहा कि उसी दिन केंद्र सरकार ने 28 रोहिंग्याओं को जबरन निर्वासित कर दिया।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि उन्हें हथकड़ी लगाकर अंडमान ले जाया गया, लाइफ जैकेट पहनाई गई और म्यांमार की ओर धकेल दिया गया। याचिकाकर्ता का दावा है कि निर्वासित लोगों ने म्यांमार से अपने रिश्तेदारों को फोन कर बताया कि उनकी जान को गंभीर खतरा है।

 सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? “कोरी कल्पना और सोशल मीडिया से ली गई बातें”

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस कोटिश्वर सिंह की बेंच ने याचिकाकर्ताओं की बातों को खारिज करते हुए कहा:

“ये सब बातें केवल दावे हैं। जब तक कोई ठोस और सत्यापन योग्य साक्ष्य पेश नहीं किया जाता, हम पूर्व आदेश में संशोधन नहीं करेंगे। देश पहले ही गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है, इस तरह की काल्पनिक याचिकाएं न्याय का अपमान हैं।”

भारत का रुख: Rohingyas are not citizens, have no legal right to stay

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दो टूक कहा:

  • भारत ने Refugee Convention पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं

  • UNHCR द्वारा जारी कार्ड भारत में कानूनी मान्यता नहीं रखते

  • विदेशी अधिनियम के तहत सरकार को अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने का अधिकार है

उन्होंने 8 अप्रैल 2021 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी हवाला दिया जिसमें कोर्ट ने निर्वासन प्रक्रिया को जायज़ ठहराया था।

 International Law vs National Sovereignty: क्या रोहिंग्याओं को शरण देना अनिवार्य है?

कॉलिन गोंसाल्विस ने ICJ और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि रोहिंग्या “शरणार्थी” हैं, न कि “प्रवासी”।
उन्होंने चकमा समुदाय पर पुराने फैसलों की मिसाल देते हुए कहा कि जान के खतरे को देखते हुए भारत को उन्हें निर्वासित नहीं करना चाहिए।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जवाब दिया:

“हम संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट पर अभी कोई टिप्पणी नहीं करेंगे। यह याचिका 31 जुलाई को लंबित मामलों के साथ सुनी जाएगी।”

 Rohingya Crisis in India: एक नज़र में

  • रोहिंग्या म्यांमार के रखाइन प्रांत के निवासी हैं

  • 2017 में सैन्य कार्रवाई के बाद लाखों लोग भारत-बांग्लादेश में शरणार्थी बने

  • भारत में लगभग 8,000 रोहिंग्या, जिनमें से 800 दिल्ली में

  • कई रोहिंग्या हिरासत केंद्रों में रखे गए हैं

  • भारत उन्हें अवैध प्रवासी मानता है, नागरिक नहीं

सवाल उठता है: क्या मानवीय संवेदना कानून पर भारी हो सकती है?

एक तरफ भारत की आंतरिक सुरक्षा और सीमित संसाधनों का तर्क है, वहीं दूसरी ओर है मानवाधिकार, शरणार्थी सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय नैतिकता का सवाल।
यह केस इस बात की मिसाल बन सकता है कि भारत किस हद तक राष्ट्रीय हित और मानव अधिकारों के बीच संतुलन बनाता है।