नई पीढ़ी को सिखाए कुमाऊं के लोक संस्कार, सांस्कृतिक कार्यशाला में बजीं ठुल गीतों की धुन
उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति और पारंपरिक लोकगीतों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए देहरादून में एक महत्वपूर्ण पहल की गई। कूर्मांचल सांस्कृतिक एवं कल्याण परिषद (Kurmanchal Cultural and Welfare Council) की कांवली शाखा द्वारा आयोजित त्रि-दिवसीय भाषा एवं संस्कृति विकास कार्यशाला में कुमाऊं की लोक संस्कृति, लोकाचार और लोक संस्कारों से नई पीढ़ी को परिचित कराया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत और उद्देश्य
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कार्यशाला का उद्घाटन दीप प्रज्वलन के साथ हुआ, जिसमें केंद्रीय अध्यक्ष कमल रजवार, सचिव गोविंद पांडे, संरक्षक पीसी लोशाली और शाखा अध्यक्ष भारती पांडे उपस्थित रहे।
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आयोजन स्थल रहा देहरादून का जीएमएस रोड स्थित कूर्मांचल भवन, जहां तीन दिन तक पारंपरिक गीतों, संस्कारों और उपमाओं पर चर्चा हुई।
संस्कार गीतों में छुपा जीवन का विज्ञान
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं भारती पांडे ने कहा कि:
“हमारे संस्कार गीत केवल संगीत नहीं, बल्कि वेदों की गूंज और विज्ञान का सार हैं। इनमें सृष्टि की रचना, जीवन के दस कर्म और लोकमान्यताओं की झलक मिलती है।”
उन्होंने शकुनाखर, पुण्याहवाच, मातृका पूजन, जातकर्म, छठी, नामकरण, ठुल गीत, पासिणी गीत, शैली गीत, परिचय गीत जैसे कई कुमाऊंनी लोक संस्कार गीतों (Kumaoni Sanskar Geet) का उल्लेख किया।
ठुल गीतों के संरक्षण पर ज़ोर
कार्यक्रम की संयोजक किरण जोशी ने “ठुल गीतों” के संरक्षण और दस्तावेजीकरण पर बल दिया।
कार्यक्रम का संचालन प्रेमलता बिष्ट ने किया और कई वरिष्ठों ने भी अपने विचार साझा किए:
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मदन मोहन, आशा लोहानी, मनोरमा पांडे, शोभा पांडे, कलावती जोशी सहित कई वरिष्ठ कलाकारों और विचारकों ने लोक परंपरा को जीवित रखने की अपील की।