High Court ने पलटा VC का action, प्रोफेसर के खिलाफ आरोपपत्र पर बड़ा आदेश

Uttarakhand High Court ने Pantnagar University से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में साफ किया है कि विश्वविद्यालय के Vice-Chancellor (VC) को किसी प्रोफेसर के खिलाफ सीधे charge sheet जारी करने का अधिकार नहीं है। अदालत ने इस निष्कर्ष के साथ विश्वविद्यालय प्रशासन को निर्देश दिया कि विवादित आरोपपत्र तुरंत वापस लिया जाए। इस फैसले को university disciplinary proceedings और VC powers के संदर्भ में एक अहम judicial clarification माना जा रहा है।

यह मामला गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के प्रोफेसर शिवेंद्र कश्यप से जुड़ा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने 5 फरवरी 2026 के आरोपपत्र और उसके आधार पर शुरू की गई विभागीय कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। प्रोफेसर कश्यप Agricultural Communication विभाग से जुड़े हैं और DST-TEC (Technology Enabling Centre) के समन्वयक भी बताए गए हैं।

याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने कहा कि इस मामले में जारी charge sheet वैधानिक ढांचे के अनुरूप नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अदालत के सामने यह दलील रखी गई कि Uttarakhand Government Servants (Discipline and Appeal) Rules, 2003 के तहत आरोपपत्र उसी प्राधिकारी द्वारा जारी और हस्ताक्षरित होना चाहिए, जो नियुक्ति और अनुशासनात्मक कार्रवाई का सक्षम प्राधिकारी हो।

प्रोफेसर की ओर से यह तर्क दिया गया कि आरोपपत्र Chief Personnel Officer ने कुलपति की ओर से जारी किया, जबकि ऐसा करना नियमों के अनुरूप नहीं था। साथ ही यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति Board of Management द्वारा की जाती है, न कि कुलपति द्वारा। इसी आधार पर यह दलील दी गई कि Vice-Chancellor इस मामले में charge sheet जारी करने के लिए competent authority नहीं थे। हाईकोर्ट ने इसी तर्क को स्वीकार करते हुए विवादित आरोपपत्र वापस लेने का निर्देश दिया।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में विश्वविद्यालय नया आरोपपत्र जारी करना चाहता है, तो उसे lawful procedure और सक्षम प्राधिकारी की प्रक्रिया का पालन करना होगा। साथ ही, प्रोफेसर को यह स्वतंत्रता भी दी गई कि अगर दोबारा कोई नया charge sheet जारी होता है, तो वे उसे कानून के अनुसार चुनौती दे सकते हैं। इसका मतलब यह है कि अदालत ने केवल मौजूदा आरोपपत्र पर आपत्ति जताई है, न कि भविष्य की वैधानिक कार्रवाई के रास्ते को पूरी तरह बंद किया है।

यह फैसला केवल एक व्यक्तिगत राहत भर नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन में disciplinary authority की सीमाओं को लेकर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह संदेश गया है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में भी प्रशासनिक कार्रवाई तय नियमों और वैधानिक अधिकार-सीमा के भीतर ही की जानी चाहिए। Pantnagar University professor case अब उन मामलों में शामिल हो गया है, जिनमें अदालत ने procedural legality को substantive fairness जितना ही महत्वपूर्ण माना है। यह अंतिम वाक्य उपलब्ध रिपोर्ट्स पर आधारित विश्लेषण है।