Cash Controversy के बाद इस्तीफा, फिर भी जजों की लिस्ट में नाम कायम

दिल्ली हाई कोर्ट में तैनाती के दौरान Cash Controversy में घिरे Justice Yashwant Varma एक बार फिर चर्चा में हैं। जस्टिस यशवंत वर्मा ने भले ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया हो, लेकिन उनका नाम अब भी Allahabad High Court की आधिकारिक जजों की सूची में शामिल है। यही वजह है कि अब Constitution Rules और Judge Resignation Process को लेकर बहस तेज हो गई है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट की वेबसाइट पर जारी जजों की सूची में जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम अब भी शीर्ष जजों में शामिल दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इलाहाबाद में तैनात जजों की सूची में उनका नाम तीसरे स्थान पर दर्ज है। उनसे ऊपर केवल जस्टिस एमसी त्रिपाठी और जस्टिस अरिंदम सिन्हा के नाम हैं।

यह पूरा मामला उस समय चर्चा में आया था जब दिल्ली में उनके आवास से कथित तौर पर भारी मात्रा में Cash बरामद होने की खबर सामने आई थी। बताया गया था कि कुछ नकदी जली हुई हालत में भी मिली थी। इसके बाद उनका ट्रांसफर इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया था। मामले ने इतना तूल पकड़ा कि उनके खिलाफ Impeachment Process यानी महाभियोग की चर्चा भी शुरू हो गई थी।

इसी विवाद के बीच जस्टिस वर्मा ने 9 अप्रैल को राष्ट्रपति Droupadi Murmu को पत्र लिखकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि वह नहीं चाहते कि राष्ट्रपति कार्यालय की गरिमा पर किसी तरह का असर पड़े और इसलिए वह तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे रहे हैं।

हालांकि सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब उन्होंने “Immediate Effect” यानी तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दिया था, तो फिर उनका नाम अब तक जजों की सूची में क्यों बना हुआ है।
दरअसल, भारतीय संविधान के Article 217(1) में हाई कोर्ट जजों के इस्तीफे से जुड़े नियम बताए गए हैं। इसके अनुसार कोई भी जज राष्ट्रपति को संबोधित पत्र देकर इस्तीफा दे सकता है और जिस तारीख से इस्तीफा लागू करने की बात लिखी जाती है, उसी तारीख से इस्तीफा प्रभावी माना जाता है।

इस मामले में Supreme Court की पांच जजों की संविधान पीठ का 1978 का एक महत्वपूर्ण फैसला भी चर्चा में है। जस्टिस गोपाल चंद्र मिश्रा केस में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जज का इस्तीफा उस तारीख से प्रभावी माना जाएगा, जिसका उल्लेख पत्र में किया गया हो।
फिलहाल माना जा रहा है कि जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा अभी औपचारिक प्रक्रिया में लंबित है और राष्ट्रपति कार्यालय से अंतिम निर्णय का इंतजार किया जा रहा है। इसी कारण उनका नाम अभी तक हाई कोर्ट की सूची में बना हुआ है। यह मामला अब सिर्फ एक Judge Resignation Issue नहीं रह गया है, बल्कि Judicial System, Constitution Process और High Court Administration को लेकर भी बड़े सवाल खड़े कर रहा है।