पार्टी में टूट के बाद किसे मिला नाम और चुनाव चिन्ह? अखिलेश, शिंदे और अजित पवार के मामले

Political Party Symbol Dispute: किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में दो गुट बनने पर पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह का अधिकार किसे मिलेगा, यह सवाल कई बार सामने आया है। समाजवादी पार्टी, शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी NCP से जुड़े विवादों में चुनाव आयोग ने अलग-अलग परिस्थितियों में अपने फैसले दिए हैं। अब तृणमूल कांग्रेस यानी TMC के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर जारी विवाद के बीच इन पुराने मामलों की चर्चा फिर हो रही है।

हालांकि, हर मामले के तथ्य और चुनाव आयोग के सामने मौजूद दस्तावेज अलग रहे हैं। इसलिए किसी एक पुराने फैसले को दूसरे मामले पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।

अखिलेश यादव को कैसे मिली सपा और साइकिल?

साल 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव और तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के गुटों के बीच पार्टी नेतृत्व और चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद चुनाव आयोग तक पहुंचा था।

आयोग ने 16 जनवरी 2017 को अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले गुट को समाजवादी पार्टी माना और उसे पार्टी के आरक्षित ‘साइकिल’ चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल का अधिकार दिया। आयोग ने अपने फैसले में संगठनात्मक और विधायी दोनों स्तरों पर समर्थन के आंकड़ों पर विचार किया था।

अखिलेश गुट की ओर से आयोग के सामने 228 में से 205 विधायकों, 68 में से 56 MLCs, 24 में से 15 सांसदों और 46 में से 28 राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्यों के समर्थन के हलफनामे पेश किए गए थे। राष्ट्रीय सम्मेलन के 5,731 प्रतिनिधियों में से 4,400 के समर्थन के दस्तावेज भी दाखिल किए गए थे।

आयोग ने इस मामले में Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के पैरा 15 और सुप्रीम कोर्ट के Sadiq Ali मामले में बताए गए सिद्धांतों को ध्यान में रखा था।

शिंदे गुट को कैसे मिला शिवसेना का नाम और धनुष-बाण?

महाराष्ट्र में साल 2022 में शिवसेना में विभाजन के बाद एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे गुटों के बीच पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद हुआ। चुनाव आयोग ने फरवरी 2023 में शिंदे गुट को ‘शिवसेना’ नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह देने का फैसला किया।

इस मामले में आयोग ने कहा कि संगठनात्मक विंग से जुड़े आंकड़ों से कोई निर्णायक निष्कर्ष नहीं निकल रहा था। इसलिए उसने मुख्य रूप से legislative majority test को आधार बनाया।

शिंदे गुट ने 55 शिवसेना विधायकों में से 40 और 18 लोकसभा सांसदों में से 13 के समर्थन का दावा किया था। आयोग के आकलन में विधायी विंग में शिंदे गुट के समर्थन को महत्वपूर्ण पाया गया।

यानी शिवसेना मामले में चुनाव आयोग का निष्कर्ष मुख्य रूप से विधायी विंग में उपलब्ध समर्थन और उससे जुड़े रिकॉर्ड पर आधारित था।

अजित पवार के गुट को कैसे मिली NCP और घड़ी?

साल 2023 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी NCP में शरद पवार और अजित पवार के गुट अलग हो गए। अजित पवार के साथ बड़ी संख्या में विधायक चले गए और मामला चुनाव आयोग के सामने पहुंचा।

6 फरवरी 2024 को चुनाव आयोग ने अजित पवार के नेतृत्व वाले गुट को Nationalist Congress Party (NCP) माना और उसे पार्टी के आरक्षित ‘घड़ी’ चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल का अधिकार दिया। आयोग ने अपने आदेश में संगठनात्मक और विधायी विंग में उपलब्ध समर्थन सहित कई पहलुओं पर विचार किया।

आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, अजित पवार गुट के साथ NCP के 53 विधायकों में से 40 से अधिक विधायक थे। इस संख्या को भी मामले में महत्वपूर्ण माना गया।

इसके बाद शरद पवार के नेतृत्व वाले गुट को अलग नाम और चुनाव चिन्ह के साथ राजनीतिक गतिविधियां जारी रखनी पड़ीं। ECI की मौजूदा सूची में Nationalist Congress Party और Nationalist Congress Party – Sharadchandra Pawar अलग-अलग दलों के रूप में दर्ज हैं।

चुनाव आयोग किन बातों को देखता है?

राजनीतिक दल में विभाजन के मामलों में Election Symbols Order, 1968 का पैरा 15 महत्वपूर्ण है। आयोग उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए यह तय कर सकता है कि विरोधी गुटों में से कौन मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है या किसी भी गुट को वह दर्जा न दिया जाए।

पुराने मामलों में आयोग ने पार्टी के संविधान, संगठनात्मक समर्थन और विधायी समर्थन जैसे पहलुओं को देखा है। हालांकि, हर विवाद में इन पहलुओं का महत्व मामले के उपलब्ध रिकॉर्ड और परिस्थितियों के आधार पर अलग हो सकता है।

अब TMC विवाद में क्या स्थिति है?

तृणमूल कांग्रेस के मामले में फिलहाल चुनाव आयोग ने किसी एक गुट को पार्टी का स्थायी नाम और आरक्षित चुनाव चिन्ह नहीं दिया है। 17 सितंबर 2026 के interim order में आयोग ने दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को आगामी पश्चिम बंगाल उपचुनावों के लिए ‘All India Trinamool Congress’ नाम और आरक्षित ‘Flowers and Grass’ चुनाव चिन्ह इस्तेमाल करने से रोक दिया।

आयोग के अनुसार, उसके सामने TMC के दो प्रतिद्वंद्वी गुट हैं और दोनों ही खुद को मान्यता प्राप्त पार्टी बताते हैं। इसलिए मामले में Symbols Order, 1968 के Para 15 के तहत आगे substantive determination की जरूरत है।

अंतरिम व्यवस्था आगामी नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा उपचुनावों को देखते हुए की गई है। दोनों गुटों को अलग नाम और चुनाव चिन्ह के विकल्प देने के निर्देश दिए गए हैं। यह व्यवस्था अंतिम निर्णय तक लागू रहने वाली है।

तीनों पुराने मामलों और TMC में क्या समझना जरूरी है?

सपा, शिवसेना और NCP के मामलों में चुनाव आयोग ने उपलब्ध समर्थन और संगठनात्मक स्थिति से जुड़े दस्तावेजों के आधार पर अलग-अलग निष्कर्ष निकाले। अखिलेश यादव के मामले में संगठन और विधायी विंग दोनों में समर्थन के आंकड़े सामने रखे गए थे। शिवसेना मामले में संगठनात्मक आंकड़े निर्णायक न होने पर विधायी विंग के बहुमत परीक्षण पर ज्यादा भरोसा किया गया। NCP मामले में भी संगठनात्मक और विधायी समर्थन से जुड़े रिकॉर्ड पर विचार हुआ।

TMC में अभी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। इसलिए पुराने मामलों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना कि आगे किस गुट को पार्टी का नाम या चुनाव चिन्ह मिलेगा, फिलहाल उचित नहीं होगा। अंतिम स्थिति चुनाव आयोग के आगे के निर्णय पर निर्भर करेगी।