1320 MW पावर डील पर कांग्रेस के गंभीर सवाल, सरकार ने आरोपों पर दिया ये जवाब

उत्तराखंड में 1320 MW Thermal Power Procurement को लेकर राजनीतिक विवाद बढ़ गया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि अडानी पावर से बिजली खरीदने के लिए टेंडर की शर्तों में बड़े स्तर पर बदलाव किए गए। पार्टी का दावा है कि कुल 86 शर्तों में से 84 में बदलाव किया गया, जिससे प्रक्रिया से जुड़े कई सवाल खड़े होते हैं।

वहीं, उत्तराखंड सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि बिजली खरीद की प्रक्रिया नियमों के अनुसार हुई है। सरकार के मुताबिक Tariff Based Competitive Bidding के जरिए सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी का चयन हुआ और प्रक्रिया में उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग यानी UERC की मंजूरी भी शामिल है।

1320 MW बिजली खरीद को लेकर क्या है पूरा मामला?

उत्तराखंड कैबिनेट ने अगस्त 2026 में UPCL को अडानी पावर लिमिटेड से 25 वर्षों तक 1320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली खरीदने के लिए Power Supply Agreement करने की मंजूरी दी थी। रिपोर्टों के अनुसार बिजली की दर ₹5.746 प्रति यूनिट तय हुई है और इसमें 1234 MW contracted capacity शामिल है।

इससे पहले उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग ने 8 जुलाई 2026 को 1320 MW RTC coal-based power की long-term procurement से जुड़ी प्रक्रिया पर आदेश जारी किया था। आयोग के रिकॉर्ड में RFP और PSA की कुछ शर्तों में deviation, modification और clarification से जुड़े मामले भी दर्ज हैं।

कांग्रेस ने लगाए क्या आरोप?

कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने आरोप लगाया कि पहले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से जुड़ी प्रस्तावित परियोजना को आगे बढ़ाने के बजाय बाद में बिजली खरीद के लिए नई निविदा प्रक्रिया शुरू की गई।

खेड़ा का दावा है कि Model Bidding Document की 86 शर्तों में से 84 में बदलाव किए गए। कांग्रेस ने इन बदलावों को लेकर यह सवाल उठाया कि क्या इससे किसी संभावित bidder को फायदा पहुंचने की स्थिति बनी। पार्टी ने यह भी दावा किया कि 25 साल के Power Purchase Agreement से राज्य के बिजली उपभोक्ताओं पर लंबे समय में बड़ा वित्तीय बोझ पड़ सकता है।

हालांकि, ये कांग्रेस द्वारा लगाए गए आरोप हैं और इन्हें सरकार ने स्वीकार नहीं किया है।

सरकार ने क्या दी सफाई?

उत्तराखंड सरकार के प्रधान सचिव ऊर्जा आर. मीनाक्षी सुंदरम ने आरोपों पर सफाई देते हुए कहा कि बिजली खरीद की प्रक्रिया निर्धारित नियमों, technical requirements और competitive bidding के आधार पर आगे बढ़ाई गई।

सरकार के अनुसार केंद्रीय बिजली मंत्रालय का 2019 का Model Bidding Document एक सामान्य दस्तावेज है। अलग-अलग परियोजनाओं की technology, location, fuel availability और transportation cost जैसी परिस्थितियों को देखते हुए इसमें बदलाव किए जा सकते हैं। सरकार ने कहा कि bidders से मिले सुझावों और आपत्तियों की तकनीकी तथा व्यावहारिक स्तर पर समीक्षा की गई और प्रस्तावित बदलावों को UERC के सामने रखा गया।

सरकार ने यह भी कहा कि अडानी पावर का चयन बिना competition के सीधे नहीं हुआ, बल्कि Tariff Based Competitive Bidding प्रक्रिया के तहत हुआ। सरकारी पक्ष के अनुसार ₹5.746 प्रति यूनिट की दर lowest bid के रूप में सामने आई।

छत्तीसगढ़ से आएगी उत्तराखंड के लिए बिजली

इस Power Procurement Deal की एक खास बात यह है कि बिजली का स्रोत उत्तराखंड में नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ स्थित thermal power plant है। सरकार के मुताबिक राज्य में hydro power पर अधिक निर्भरता होने के कारण सर्दियों और अन्य मौसमों में supply को लेकर चुनौतियां आती हैं। ऐसे में long-term thermal power procurement को energy security के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।

सरकार का कहना है कि 25 साल की अवधि के लिए बिजली खरीद से राज्य की long-term power requirement को पूरा करने और भविष्य की कीमतों में अनिश्चितता कम करने में मदद मिलेगी।

कांग्रेस ने सरकार से पूछे आठ सवाल

कांग्रेस ने इस पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक करने और स्वतंत्र जांच की मांग की है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने सरकार से कई सवाल पूछे हैं। इनमें प्रमुख सवाल टेंडर की शर्तों में बदलाव, बदलावों का प्रस्ताव देने वाली संस्था, संभावित bidders पर उनके प्रभाव और छत्तीसगढ़ से बिजली खरीदने के कारणों से जुड़े हैं।

कांग्रेस ने यह भी पूछा है कि ₹5.746 प्रति यूनिट की Competitive Bidding का पूरा डेटा कब सार्वजनिक किया जाएगा और 25 साल के Power Purchase Agreement की प्रमुख शर्तें जनता के सामने क्यों नहीं रखी जा रही हैं।

इसके अलावा पार्टी ने यह जानना चाहा है कि इस समझौते से उत्तराखंड के बिजली उपभोक्ताओं को वास्तविक आर्थिक लाभ कितना मिलेगा।

अब विवाद का केंद्र क्या है?

इस पूरे मामले में फिलहाल दो अलग-अलग दावे सामने हैं। कांग्रेस का कहना है कि tender conditions में बड़े पैमाने पर बदलाव से प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं और इससे राज्य के उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है।

दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि बदलाव परियोजना की तकनीकी और व्यावहारिक जरूरतों को ध्यान में रखकर किए गए, प्रक्रिया competitive bidding के जरिए हुई और UERC की regulatory scrutiny भी इसमें शामिल रही।

उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग के रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट है कि 1320 MW की long-term coal-based power procurement से जुड़े RFP और PSA में बदलाव/स्पष्टीकरण के मामलों पर आयोग के सामने प्रक्रियाएं चली हैं।