What will the next Vice President have to do to save the dignity of the Rajya Sabha?
देश में Parliament vs Judiciary Debate एक बार फिर चर्चा में है। उपराष्ट्रपति Jagdeep Dhankhar ने मंगलवार को फिर से स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारतीय लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च (Parliament is Supreme) है और उससे ऊपर कोई भी Constitutional Authority नहीं हो सकती।
“Elected Representatives Define the Constitution” – उपराष्ट्रपति
धनखड़ ने कहा कि Constitution को किस रूप में लागू करना है, उसमें संशोधन कैसे होने हैं, ये सब कुछ संसद तय करती है। और सांसदों के ऊपर कोई भी अन्य संस्था या पद नहीं हो सकता। यह टिप्पणी उन्होंने उन आलोचनाओं के जवाब में दी है जो उन्होंने कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय को लेकर की थी।
Supreme Court पर फिर से उठे सवाल
उपराष्ट्रपति ने अपने पिछले बयान का बचाव करते हुए कहा,
“मैंने जो कहा, वह राष्ट्र हित में था। जब किसी संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति बयान देता है, तो वह सिर्फ देश के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखकर देता है।”
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असली ताकत जनप्रतिनिधियों के पास होती है और Judiciary या अन्य संस्थाएं संसद से ऊपर नहीं हो सकतीं।
क्या Article 142 से न्यायपालिका को मिली ‘Absolute Power’?
धनखड़ ने Supreme Court द्वारा Article 142 के इस्तेमाल पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा,
“अब हालात ऐसे बन गए हैं कि Supreme Court राष्ट्रपति को भी निर्देश देने लगा है। Court कह रहा है कि यदि राष्ट्रपति समय पर फैसला नहीं लेते तो बिल को मंजूरी मान लिया जाएगा।”
उन्होंने Article 142 को “Judiciary के हाथों दिया गया परमाणु हथियार” करार दिया, और कहा कि इससे देश में Constitutional Balance प्रभावित हो सकता है।
तमिलनाडु Bills और राष्ट्रपति को लेकर टिप्पणी
धनखड़ की टिप्पणी तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों और उनकी मंजूरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के संदर्भ में आई। कोर्ट ने कहा था कि यदि तय समय में राष्ट्रपति फैसला नहीं करते हैं तो Bills को पास माना जाएगा।
इसपर उपराष्ट्रपति ने कहा कि ऐसे में तो Judiciary ही संसद चलाना चाहती है, जो लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है।
Opposition का पलटवार: कपिल सिब्बल ने की आलोचना
राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील Kapil Sibal ने उपराष्ट्रपति के बयान की आलोचना करते हुए कहा कि
“यह Supreme Court की संस्था को कमजोर करने वाला बयान है। Judiciary की स्वतंत्रता को ऐसे बयान से नुकसान पहुंच सकता है।”