If Pandher and Koli are not guilty, then who is the culprit?” – the question of the family of the Nithari case victim
नोएडा के निठारी में वह मकान आज भी खंडहर बन चुका है — झाड़ियों से घिरा, वीरान और डरावना। कभी इस घर ने पूरे देश को हिला दिया था, जब 2006 में यहां से बच्चों के कंकाल मिले थे। अब यह घर उस भयावह घटना की याद दिलाता है जिसे लोग ‘House of Horrors’ कहते हैं।
मंगलवार को Supreme Court ने इस कांड के मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली (Surendra Koli) की rape और murder के एक मामले में सुनाई गई सज़ा को निरस्त कर दिया।
Chief Justice B. R. Gavai, Justice Surya Kant और Justice Vikram Nath की बेंच ने कोली की curative petition स्वीकार करते हुए कहा कि अगर उस पर कोई और केस लंबित नहीं है तो उसे रिहा किया जाए।
2006 का खौफनाक खुलासा
29 दिसंबर 2006 को निठारी स्थित व्यवसायी मोनिंदर सिंह पंढेर (Moninder Singh Pandher) के घर के पीछे की नाली से 8 बच्चों के कंकाल मिले थे।
कोली उस वक्त पंढेर का domestic help था। इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया था और इसे “Nithari Serial Killings” कहा गया।
पीड़िता के माता-पिता का दर्द: “हमने पुलिस को चेताया था, पर किसी ने नहीं सुना”
अब 63 और 60 साल के हो चुके पीड़िता के माता-पिता कहते हैं कि “न्याय व्यवस्था ने हमें बार-बार धोखा दिया।”
पीड़िता की मां ने कहा,
“हम बार-बार पुलिस से कहते थे कि उस घर में कुछ अजीब चल रहा है, लेकिन वे कहते थे कि हम कल्पना कर रहे हैं।”
ज्यादातर पीड़ित परिवार अब बिहार और पश्चिम बंगाल लौट गए हैं, लेकिन यह परिवार आज भी उसी इलाके में रहता है।
वे पास ही एक छोटी सी दुकान से कपड़े प्रेस करने का काम करते हैं। मां ने बताया,
“पंढेर के घर से कपड़े आते थे जिन पर अजीब दाग होते थे। जब मैं कोली से पूछती, तो वह कहता — साहब मुर्गा खरीदते वक्त कसाई के पास खड़े थे, इसलिए दाग लग गया।”
“वह डॉक्टर बनना चाहती थी…”
उनकी बेटी गर्मियों की एक शाम सिलाई का काम करवाने गई थी और फिर कभी वापस नहीं लौटी।
उनके झुग्गी के कोने में आज भी उसकी एक फीकी तस्वीर टंगी है।
मां ने कहा, “वह पढ़ाई में बहुत अच्छी थी, डॉक्टर बनना चाहती थी।”
“अगर पंढेर और कोली निर्दोष हैं, तो फिर हमारी बच्ची को किसने मारा?”
Supreme Court verdict पर पिता ने कहा,
“अगर पंढेर दोषी नहीं, कोली दोषी नहीं, तो फिर कौन है?
अगर इनकी रिहाई के लिए पुलिस ज़िम्मेदार है, तो उन्हें फांसी मिलनी चाहिए।
बच्चे इसलिए मारे गए क्योंकि वे गरीब थे।”
मां ने सवाल किया,
“मैंने अपनी आंखों से देखा था जब नाली से शव निकाले जा रहे थे।
पुलिस ने मजदूरों और बच्चों के ID cards घर से बरामद किए थे।
मेरी बेटी के कपड़े भी उसी घर से मिले थे।
फिर कोर्ट ने उन्हें निर्दोष कैसे मान लिया?”
“हम अब थक चुके हैं… न्याय का भरोसा नहीं रहा”
पिता ने बताया कि उन्हें अपनी जमीन और घर बेचना पड़ा ताकि वकीलों की फीस दी जा सके।
अब वे किराए की झुग्गी में रहते हैं।
उन्होंने कहा, “हम अब और लड़ नहीं सकते, कोई हमारी परवाह नहीं करता।”
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि वे निठारी नहीं छोड़ सकते, क्योंकि अब उनका पूरा परिवार यहीं बस गया है।
मां ने टूटे दिल से कहा,
“अगर वो जिंदा होती, तो आज उसकी भी शादी हो चुकी होती…
जब मैं अपने पांच बच्चों को खाना परोसती हूं, तो अक्सर भूल जाती हूं कि एक अब हमारे बीच नहीं है…
तभी आंखों से आंसू अपने आप निकल आते हैं।”
न्याय और व्यवस्था पर सवाल
करीब दो दशक बाद भी यह केस भारत की न्याय प्रणाली (Indian justice system) पर कई सवाल छोड़ जाता है —
जब Victims के परिवारों को न तो सज़ा मिली, न जवाब, तो क्या वास्तव में यह मामला खत्म हो गया?