Education Sector Reform: Delegation meets CM Dhami, demands for Fees Act intensify
उत्तराखंड सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए एक नया नियम लागू किया है, जिसमें कहा गया है कि कोई भी सरकारी कर्मचारी यदि ₹5,000 या एक महीने के वेतन (जो भी कम हो) से अधिक की चल संपत्ति (Movable Property) की खरीद, बिक्री या लेन-देन करता है, तो उसे इसकी सूचना तुरंत अपने विभागाध्यक्ष या ‘उपयुक्त प्राधिकारी’ को देनी होगी।
यह नियम 14 जुलाई 2025 को एक अधिसूचना (official directive) के ज़रिए लागू किया गया है।
कौन-कौन से लेन-देन आएंगे नियम के दायरे में?
साड़ी, कपड़े, गहने जैसे रोज़मर्रा के सामान यदि ₹5,000 से अधिक कीमत के हैं।
गिफ्ट (Gift) या Donation के रूप में दी गई संपत्तियाँ।
लेन-देन ऐसे व्यक्ति के साथ हो जो “regular or reputed dealer” नहीं है।
लीज़ (Lease), किराए (Rent), और गिफ्ट में दी गई चल/अचल संपत्तियाँ भी शामिल।
Non-reputed dealer से लेन-देन के लिए पूर्व-स्वीकृति (prior approval) लेना अनिवार्य होगा।
क्या अब साड़ी खरीदने के लिए भी लेनी होगी अनुमति?
सरकारी कर्मचारियों के यूनियन ने इस आदेश की तीखी आलोचना की है।
SC-ST कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष करम राम ने कहा:
“अगर कोई अपनी पत्नी के लिए साड़ी खरीदता है, या बच्चों के लिए कपड़े — तो क्या वो भी अब अनुमति लेकर करेगा?”
उन्होंने कहा कि आज की महंगाई और टैक्स सिस्टम को देखते हुए ₹5,000 की सीमा बहुत कम है और इसे कम से कम ₹1 लाख किया जाना चाहिए।
क्या ये नियम सिर्फ चल संपत्ति पर लागू है?
नहीं, यह नियम अचल संपत्ति (Immovable Property) पर भी लागू होता है।
जमीन, मकान, प्लॉट आदि की खरीद-बिक्री, लीज़ या गिफ्ट के लिए विभाग की अनुमति लेना आवश्यक है।
कर्मचारियों को अपने कार्यकाल के हर 5 साल में अपनी संपत्ति की घोषणा (Asset Declaration) करनी होगी।
साथ ही, पत्नी/पति या परिवार के उन सदस्यों की संपत्ति की भी जानकारी देनी होगी जो साथ में रह रहे हैं।
क्या कहता है सरकारी आदेश?
NDTV रिपोर्ट के अनुसार:
“कोई भी सरकारी कर्मचारी जो अपने एक महीने के वेतन या ₹5,000 से अधिक की चल संपत्ति का लेन-देन करता है, उसे तुरंत इसकी सूचना संबंधित अधिकारी को देनी होगी।”
Karam Ram employee union statement
उत्तराखंड सरकार का यह नियम transparency और accountability बढ़ाने के मकसद से लाया गया है, लेकिन इससे जुड़ी ambiguity और practicality पर सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि आदेश के बेहतर कार्यान्वयन के लिए इसे revise करना आवश्यक है ताकि कर्मचारियों की day-to-day खरीदारी पर अनावश्यक बोझ न पड़े।