Major impact of climate change! Rising warm nights in the Himalayas are increasing the risk of floods and water crises.
Climate Change, Himalayan Glacier Melting और IIT Kharagpur Research को लेकर एक चिंताजनक अध्ययन सामने आया है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT Kharagpur) के वैज्ञानिकों की नई रिसर्च के अनुसार Hindu Kush Himalaya क्षेत्र में रात का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। इसका सीधा असर ग्लेशियरों पर पड़ रहा है, जिसके कारण हर वर्ष लगभग 22 गीगाटन (Gigaton) बर्फ पिघल रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले वर्षों में जल संकट, बाढ़, भूस्खलन और Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) जैसी आपदाओं का खतरा कई गुना बढ़ सकता है।
गर्म रातें बढ़ा रही हैं ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार
शोधकर्ताओं के अनुसार पहले रात के समय तापमान कम होने से दिन में पिघली बर्फ दोबारा जम जाती थी, लेकिन अब रातें भी अपेक्षाकृत गर्म रहने लगी हैं। इसके कारण ग्लेशियरों को दोबारा जमने का पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है। यही वजह है कि Hindu Kush Himalaya के करीब 54,000 ग्लेशियर लगातार तेजी से सिकुड़ रहे हैं।
44 वर्षों के आंकड़ों पर आधारित है अध्ययन
IIT Kharagpur के Centre for Ocean, River, Atmosphere and Land Sciences द्वारा किया गया यह अध्ययन वर्ष 1980 से 2024 तक के 44 वर्षों के मौसम और वायुमंडलीय आंकड़ों पर आधारित है। इस रिसर्च के निष्कर्ष प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल Scientific Reports में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन में पाया गया कि उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और अन्य हिमालयी क्षेत्रों में मानसून से पहले के महीनों में रात के तापमान में हर दशक औसतन 0.6 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है।
वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को Elevation Dependent Warming कहते हैं, जिसका अर्थ है कि अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापमान अपेक्षाकृत तेज़ी से बढ़ रहा है।
क्यों बढ़ रही हैं हिमालय की गर्म रातें?
वैज्ञानिकों ने इसके दो प्रमुख कारण बताए हैं। पहला, ग्लेशियरों के पिघलने के बाद काली चट्टानें और मिट्टी बाहर आ जाती हैं, जो सूर्य की गर्मी को अधिक मात्रा में अवशोषित करती हैं। दूसरा, वातावरण में बढ़ती नमी रात के समय गर्मी को पहाड़ों में ही रोक लेती है, जिससे तापमान पर्याप्त रूप से कम नहीं हो पाता और बर्फ के दोबारा जमने की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
क्या होंगे इसके बड़े खतरे?
यदि ग्लेशियरों के पिघलने की वर्तमान गति जारी रही तो इसके दूरगामी प्रभाव दिखाई दे सकते हैं।
Drinking Water Crisis और सिंचाई के लिए पानी की कमी बढ़ सकती है।
हिमालयी राज्यों में Flood, Landslide और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति एवं तीव्रता बढ़ सकती है।
करोड़ों लोगों की Food Security और आजीविका प्रभावित हो सकती है।
Mountain Tourism, वन पारिस्थितिकी और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
ग्लेशियरों के पीछे हटने से नई Glacial Lakes बनेंगी और उनके फटने (GLOF) का खतरा बढ़ेगा।
2031 तक और गंभीर हो सकती है स्थिति
अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि तापमान बढ़ने की मौजूदा रफ्तार जारी रही तो अगले पांच वर्षों में अधिकांश हिमालयी ग्लेशियर पहले की तुलना में अधिक तेजी से पिघल सकते हैं। ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी कम और वर्षा अधिक होने की संभावना बढ़ेगी। शुरुआत में नदियों में पानी अधिक दिखाई दे सकता है, लेकिन लंबे समय में जल प्रवाह का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने लगेगा, जिससे भविष्य में जल उपलब्धता पर गंभीर असर पड़ सकता है।