Supreme Court का ऐतिहासिक फैसला: Homemakers हैं ‘Nation Builders’, योगदान का न्यूनतम मूल्य 30 हजार रुपये प्रतिमाह

सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों (Homemakers) के योगदान को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि वे केवल परिवार ही नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण (Nation Building) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अदालत ने माना कि घर और परिवार की देखभाल में महिलाओं द्वारा किया जाने वाला Unpaid Domestic Work समाज और अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन.के. सिंह की पीठ ने फैसला दिया कि यदि किसी सड़क दुर्घटना (Motor Vehicle Accident) में किसी Homemaker की मृत्यु हो जाती है, तो उसके परिवार को घरेलू देखभाल और सेवाओं के नुकसान के लिए अलग से मुआवजा दिया जाना चाहिए। अदालत ने इस योगदान का न्यूनतम मूल्य 30,000 रुपये प्रतिमाह निर्धारित किया है।

2023 Gender Stereotypes Handbook का किया उल्लेख

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2023 में तैयार किए गए Gender Stereotypes Handbook का भी हवाला दिया। यह हैंडबुक तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश D. Y. Chandrachud के कार्यकाल के दौरान तैयार की गई थी।

इस हैंडबुक में सलाह दी गई थी कि महिलाओं के लिए “Housewife” शब्द के बजाय “Homemaker” शब्द का उपयोग किया जाए। हैंडबुक के अनुसार “Housewife” शब्द एक ऐसी धारणा को बढ़ावा देता है जिससे यह लगता है कि घर के बाहर काम नहीं करने वाली महिलाएं परिवार में बहुत कम योगदान देती हैं।

वहीं “Homemaker” शब्द यह स्वीकार करता है कि महिलाएं खाना बनाना, सफाई करना, घरेलू प्रबंधन, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा और अन्य कई जिम्मेदारियों के माध्यम से परिवार के लिए महत्वपूर्ण और मूल्यवान योगदान देती हैं।

CJI Surya Kant ने हाल ही में उठाए थे सवाल

दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने इसी हैंडबुक की समीक्षा की आवश्यकता जताई थी। उन्होंने एक सुनवाई के दौरान टिप्पणी की थी कि यह हैंडबुक “बहुत अधिक Harvard-Oriented” प्रतीत होती है।

सीजेआई ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (National Judicial Academy) को नए दिशा-निर्देश तैयार करने का सुझाव दिया था। उन्होंने कहा था कि न्यायिक दिशानिर्देश भारत की सामाजिक परिस्थितियों, संस्कृति और वास्तविक अनुभवों पर आधारित होने चाहिए, न कि विदेशी मॉडल पर।

‘Homemakers वास्तव में Nation Builders हैं’

हरियाणा में वर्ष 2001 में हुए एक सड़क हादसे में मृत एक महिला के परिवार को मिलने वाले मुआवजे को बढ़ाते हुए अदालत ने कहा कि गृहिणियों को सीधे शब्दों में “Nation Builders” कहा जा सकता है।

अदालत ने कहा कि यह विडंबना है कि Homemakers को अक्सर परिवार का आश्रित (Dependent) माना जाता है, जबकि वास्तव में पूरे परिवार की कार्यप्रणाली उनके श्रम और देखभाल पर निर्भर करती है।

GDP में भी बड़ा योगदान

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि महिलाओं द्वारा किया जाने वाला Unpaid Care Work और Domestic Labour भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। अदालत ने उल्लेख किया कि विभिन्न आकलनों के अनुसार महिलाओं का यह अवैतनिक कार्य भारत की GDP में लगभग 15% से 17% तक योगदान दे सकता है।

पीठ ने कहा कि गृहिणियां बच्चों की पहली शिक्षक होती हैं और परिवारों को मजबूत बनाने में उनकी केंद्रीय भूमिका होती है। उनका दैनिक श्रम अन्य परिवार सदस्यों को शिक्षा, रोजगार और व्यवसाय के अवसरों का लाभ उठाने में सक्षम बनाता है।

महिलाओं के योगदान को मिली नई पहचान

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला महिलाओं के घरेलू और देखभाल संबंधी कार्यों को आर्थिक और सामाजिक मान्यता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे भविष्य में Motor Accident Compensation Claims और अन्य मामलों में Homemakers के योगदान का अधिक यथार्थवादी मूल्यांकन किया जा सकेगा।

यह फैसला न केवल महिलाओं के अवैतनिक श्रम को पहचान देता है, बल्कि समाज में उनकी भूमिका को लेकर मौजूद पारंपरिक धारणाओं को भी चुनौती देता है।