मकर संक्रांति पर जागेश्वर धाम में अद्भुत परंपरा, घृत कमल में लीन हुए भगवान शिव

उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित विश्वप्रसिद्ध Jageshwar Dham Almora में मकर संक्रांति के पावन अवसर पर एक बार फिर प्राचीन धार्मिक परंपरा का निर्वहन किया गया। इस दौरान Jyotirlinga Jageshwar Mahadev को 251 किलोग्राम शुद्ध देसी गाय के घी से आच्छादित कर घृत कमल गुफा में विराजमान किया गया। मान्यता है कि माघ माह के प्रथम दिन से लेकर फाल्गुन मास की शुरुआत तक भगवान भोलेनाथ यहां गुप्त साधना (Secret Meditation of Lord Shiva) में लीन रहते हैं।

मकर संक्रांति के दिन वैदिक मंत्रोच्चारण और विधि-विधान के साथ शिवलिंग पर घी का विशेष अभिषेक किया गया। मंदिर परिसर में सुबह से ही धार्मिक अनुष्ठानों की श्रृंखला शुरू हो गई थी। इस पवित्र आयोजन को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु Jageshwar Temple Uttarakhand पहुंचे, जिससे पूरा क्षेत्र “हर-हर महादेव” के जयघोष से गूंज उठा।

251 किलो घी से कैसे बनता है घृत कमल

मुख्य पुजारी हेमंत भट्ट और महामंडलेश्वर कैलाशानंद महाराज के अनुसार, मंदिर में प्राप्त शुद्ध पहाड़ी गाय के घी को पहले बड़े पात्रों में उबालकर शुद्ध किया जाता है। इसके बाद उसे जटागंगा के अत्यंत ठंडे जल से दो बार पवित्र किया जाता है, जिससे घी तुरंत जम जाता है। इसी प्रक्रिया से घी को कमल के आकार में ढाला जाता है, जिसे Ghrit Kamal Cave Ritual कहा जाता है। मंत्रोच्चारण के साथ भगवान ज्योतिर्लिंग को इस घृत कमल के भीतर स्थापित किया जाता है।

फाल्गुन में खुलेगी गुफा, घी बनेगा प्रसाद

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, Lord Shiva in Jageshwar Dham मकर संक्रांति से फाल्गुन मास के पहले दिन तक इसी घृत कमल गुफा में साधना करते हैं। फाल्गुन में गुफा खोली जाएगी और यह पवित्र घी Prasad of Jageshwar Mahadev के रूप में भक्तों को वितरित किया जाएगा। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यह घी औषधीय गुणों से भरपूर होता है और चर्म रोग, माइग्रेन, पुराने सिरदर्द, सर्दी-जुकाम और नकसीर जैसी समस्याओं में लाभकारी माना जाता है।

पौराणिक मान्यता और सदियों पुरानी परंपरा

प्राचीन कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को भगवान शिव ने धारण किया था, जिससे उनके शरीर में अत्यधिक ताप उत्पन्न हुआ। उस ताप को शांत करने के लिए देवताओं ने शिव को घी अर्पित किया। तभी से Desi Ghee Abhishek of Lord Shiva की यह परंपरा चली आ रही है, जिसे आज भी जागेश्वर धाम में पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ निभाया जाता है।