Uttarakhand Politics: The ‘Pahad vs. Maidan’ debate heats up again, with a fierce battle breaking out in the Assembly.
राज्य स्थापना के 25 साल पूरे होने पर आयोजित विशेष विधानसभा सत्र में सरकार का मकसद तो “अगले 25 साल के विकास रोडमैप” पर चर्चा करना था, लेकिन बहस का केंद्र बन गया – ‘पहाड़ बनाम मैदान’ (Pahad vs Maidan) विवाद।
3 नवंबर को राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने रजत जयंती समारोह का उद्घाटन किया था और 9 नवंबर को प्रधानमंत्री Narendra Modi ने देहरादून में 8260 करोड़ की विकास परियोजनाओं का लोकार्पण किया।
लेकिन इन सबके बावजूद सोशल मीडिया और सियासी हलकों में चर्चा का विषय रहा — पहाड़ और मैदान के बीच बढ़ती खाई।
‘Pahad vs Maidan’ Debate: विधानसभा में छिड़ी तीखी बहस
देहरादून के धर्मपुर से बीजेपी विधायक विनोद चमोली (Vinod Chamoli) ने सदन में “मूल निवास” का मुद्दा उठाकर राजनीतिक बहस को नया मोड़ दे दिया।
उन्होंने कहा, “आज हमारा मूल निवास तय नहीं है। जो कोई आता है, वह यहां का निवासी बन जाता है और असली Pahadi Uttarakhandi बस देखता रह जाता है।”
चमोली के इस बयान पर विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। कांग्रेस विधायक रवि बहादुर ने कहा, “आप बताइए, क्या हम उत्तराखंडी नहीं हैं? उत्तराखंड को पहाड़ और मैदान में मत बांटिए।”
BSP विधायक का पलटवार – “पहाड़ के नेता मैदान में बस गए”
हरिद्वार के लक्सर से BSP विधायक मोहम्मद शहज़ाद ने कहा कि यह बहस ‘पहाड़ बनाम मैदान’ की नहीं बल्कि “विकास की असमानता” की है।
उन्होंने कहा, “हरिद्वार के लोग भी उत्तराखंडी हैं। लेकिन पहाड़ के नेता खुद देहरादून और हल्द्वानी में रहते हैं, फिर पहाड़ की दुहाई क्यों देते हैं?”
शहज़ाद का कहना है कि Haridwar region के युवाओं के साथ भेदभाव होता है क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं में “गढ़वाली-कुमाऊंनी” मुहावरों के सवाल आते हैं। उन्होंने कहा, “न्याय की ज़रूरत मैदान को भी है।”
1990 के आंदोलन से 2025 की राजनीति तक — सवाल वही पुराना
90 के दशक में जब उत्तराखंड राज्य आंदोलन शुरू हुआ था, तब मुख्य मुद्दा था – पलायन रोकना और रोजगार देना।
लेकिन 25 साल बाद भी स्थिति वैसी ही है। पहाड़ों से पलायन जारी है और अब मैदान के लोग कह रहे हैं कि उन्हें भी बराबरी का हिस्सा नहीं मिला।
विनोद चमोली का कहना था कि “2000 से पहले मूल निवास प्रमाणपत्र मिलता था, लेकिन राज्य बनने के बाद कोई स्पष्ट नीति नहीं बनी।”
उनकी यह बात अब ‘भू-कानून आंदोलन (Land Law Movement)’ से भी जुड़ती दिख रही है, जो दो साल से राज्यभर में चल रहा है।
Experts View: BJP की अंदरूनी खींचतान या असली सामाजिक सवाल?
राजनीतिक विश्लेषक रतन मणि डोभाल कहते हैं कि “पहाड़ बनाम मैदान की यह बहस अब 2027 के चुनावों की तैयारी है।”
उनके मुताबिक BJP के अंदर ministerial reshuffle को लेकर असंतोष है, और नेता इस मुद्दे के ज़रिए अपनी स्थिति मज़बूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि वरिष्ठ पत्रकार गजेंद्र रावत इससे असहमत हैं। उनका कहना है, “विनोद चमोली अकेले ऐसे आंदोलनकारी रहे हैं जिन पर NSA (रासुका) लगी थी। उन्होंने मूल निवास का मुद्दा हमेशा उठाया है, यह नया नहीं है।”
रावत का तर्क है कि “BSP विधायक मोहम्मद शहज़ाद का विरोध सिर्फ़ उनकी कमजोर होती राजनीतिक पकड़ को बचाने का प्रयास है।”
Social Media से Ground तक पहुंचेगा विवाद
राजनीतिक टिप्पणीकारों का मानना है कि यह मुद्दा अब केवल social media debate नहीं रहेगा।
यह आने वाले महीनों में ground-level politics का अहम हिस्सा बनने जा रहा है।
कई विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि अगर इस बहस को “Development और Identity” की दिशा में नहीं मोड़ा गया, तो यह गढ़वाल-कुमाऊं की तरह ही एक और “भूगोल आधारित राजनीतिक विभाजन” बन सकता है।
Tourism, Migration और Employment — असली चुनौतियां बरकरार
पिछले कुछ सालों से Dhami Government ने tourism, homestay policy और wellness projects पर ज़ोर दिया है, लेकिन पहाड़ी इलाकों में अब भी migration crisis गंभीर है।
खेती घट रही है, उद्योग नहीं पहुंच पा रहे और युवाओं के लिए local employment opportunities सीमित हैं।
राज्य के विश्लेषकों का कहना है — “राजनीति ‘पहाड़ बनाम मैदान’ पर लड़ रही है, लेकिन जनता को चाहिए ‘Development vs Neglect’ का समाधान।”