Teacher Appointment Dispute: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार को दी राहत, जानिए पूरी खबर

Allahabad High Court ने एक महत्वपूर्ण आदेश में साफ कर दिया है कि Management Appointed Teachers को राज्य सरकार से वेतन (State Salary) पाने का कोई अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि तदर्थवाद (Tadarth Niyukti) खत्म करने के लिए 25 जनवरी 1999 के बाद अध्यापकों की नियुक्ति का अधिकार केवल Secondary Education Selection Board को सौंप दिया गया था। इसके बाद से प्रबंध समिति (Management Committee) का अल्पकालिक रिक्त पदों पर नियुक्ति का अधिकार समाप्त हो चुका है।

हाईकोर्ट ने साफ किया कि तदर्थ नियुक्तियों के नियमितीकरण (Regularization) के लिए कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए प्रबंध समिति द्वारा नियुक्त अध्यापक की सेवा को वैध नहीं माना जा सकता और सरकार से उसके वेतन भुगतान (Salary Payment) की मांग नहीं की जा सकती।

Court ने धारा 16(2) का हवाला देकर Appointment को बताया शून्य

कोर्ट ने Intermediate Education Act की धारा 16(2) (Section 16(2)) का जिक्र करते हुए कहा कि अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन कर की गई कोई भी नियुक्ति Void Appointment मानी जाएगी।

यह फैसला जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्र और जस्टिस पीके गिरि की खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से दायर विशेष अपील (Special Appeal) को स्वीकार करते हुए सुनाया। कोर्ट ने याची शिक्षिका राज कुमारी के पक्ष में दिए गए एकल पीठ (Single Bench) के आदेश को कानून के विरुद्ध (Against Law) बताते हुए रद्द कर दिया है।

हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि याची अध्यापिका चाहे तो अपने वेतन के लिए प्रबंध समिति से मांग कर सकती हैं, लेकिन राज्य सरकार किसी भी रूप में उनके वेतन भुगतान के लिए बाध्य नहीं होगी।

मामला क्या था?

अलीगढ़ के Bishara Inter College में सहायक अध्यापक का पद रिक्त था। बोर्ड से चयनित शिक्षक न आने पर प्रबंध समिति ने 9 मई 2005 को याची राज कुमारी की नियुक्ति कर दी थी।

जब उनकी सेवा नियमित करने की मांग को 5 फरवरी 2024 को अस्वीकार कर दिया गया, तो याची ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। एकल पीठ ने सुनवाई के बाद याची को नियमित कर राज्य सरकार से वेतन देने का आदेश दिया था।

राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि रिक्तियों पर केवल बोर्ड से ही नियुक्ति हो सकती थी और प्रबंध समिति द्वारा की गई नियुक्ति कानून के खिलाफ है। 1999 में लागू नियमों के तहत ऐसी नियुक्तियां शून्य मानी जाती हैं। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया।