ममता बनर्जी से क्यों फ्रीज हुआ TMC का नाम-निशान? जानें शिंदे और चिराग के मामलों में क्या हुआ

तृणमूल कांग्रेस यानी TMC के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद के बीच चुनाव आयोग ने फिलहाल किसी एक गुट को पार्टी का आधिकारिक नाम या ‘फूल और घास’ वाला चिन्ह नहीं दिया है। 17 सितंबर 2026 को आयोग ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए ममता बनर्जी और अरूप रॉय के नेतृत्व वाले दोनों गुटों को ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और आरक्षित चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल से रोक दिया। दोनों पक्षों को उपचुनाव के लिए अलग नाम और चुनाव चिन्ह चुनने को कहा गया है।

यह व्यवस्था अंतिम फैसला आने तक लागू रहेगी। आयोग ने कहा है कि दोनों गुट खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बता रहे हैं, इसलिए चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत मामले पर विस्तृत फैसला किया जाना है।

आखिर चुनाव आयोग पार्टी का नाम और चिन्ह कैसे तय करता है?

जब किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में दो गुट बन जाते हैं और दोनों ही खुद को मूल पार्टी बताते हैं, तो चुनाव आयोग चुनाव चिह्न आदेश के पैरा 15 के तहत मामले की सुनवाई कर सकता है। आयोग उपलब्ध दस्तावेजों, पार्टी संगठन और निर्वाचित प्रतिनिधियों के समर्थन समेत संबंधित तथ्यों पर विचार करता है। चुनाव आयोग के पुराने आदेशों में संगठनात्मक और विधायी विंग में समर्थन को महत्वपूर्ण आधार माना गया है।

इसका मतलब यह नहीं है कि हर मामले में केवल विधायकों या सांसदों की संख्या देखकर ही फैसला होता है। संबंधित पार्टी की संगठनात्मक संरचना, उपलब्ध रिकॉर्ड और मामले की परिस्थितियां भी देखी जाती हैं।

एकनाथ शिंदे को कैसे मिला शिवसेना का नाम और धनुष-बाण?

शिवसेना विवाद में चुनाव आयोग ने फरवरी 2023 में एकनाथ शिंदे गुट को ‘शिवसेना’ नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह अपने पास रखने की अनुमति दी थी। आयोग ने इस मामले में मुख्य रूप से विधायी विंग में बहुमत के परीक्षण को आधार बनाया, क्योंकि संगठनात्मक विंग से जुड़े आंकड़े निर्णायक नहीं पाए गए थे।

शिंदे गुट ने आयोग के सामने 40 विधायकों और 13 लोकसभा सांसदों के समर्थन का दावा किया था। उद्धव ठाकरे गुट की ओर से 15 विधायक और चार लोकसभा सांसदों के समर्थन का दावा किया गया था। आयोग ने उपलब्ध आंकड़ों और अन्य तथ्यों पर विचार करने के बाद शिंदे गुट को शिवसेना नाम और ‘धनुष-बाण’ चिन्ह दिया।

यानी शिंदे मामले में आयोग का फैसला सीधे तौर पर इस बात से जुड़ा था कि विधायी विंग में किस गुट के पास बहुमत का समर्थन था।

चिराग पासवान के मामले में क्या हुआ था?

लोक जनशक्ति पार्टी यानी LJP का विवाद 2021 में सामने आया था। रामविलास पासवान के निधन के बाद उनके बेटे चिराग पासवान और उनके चाचा पशुपति कुमार पारस के गुट के बीच पार्टी के नियंत्रण को लेकर विवाद हुआ। दोनों पक्षों ने पार्टी और उसके चुनाव चिन्ह पर दावा किया था।

अक्टूबर 2021 में चुनाव आयोग ने अंतरिम व्यवस्था के तहत LJP का नाम और ‘बंगला’ चुनाव चिन्ह दोनों गुटों के लिए फ्रीज कर दिया। इसके बाद दोनों पक्षों को अलग नाम और चिन्ह दिए गए।

चिराग पासवान के गुट को लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) नाम और हेलीकॉप्टर चुनाव चिन्ह मिला, जबकि पशुपति कुमार पारस के गुट को राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी नाम और सिलाई मशीन चिन्ह दिया गया। यह व्यवस्था उस समय बिहार के उपचुनावों को ध्यान में रखते हुए की गई थी।

इस मामले में भी आयोग ने तत्काल किसी एक गुट को पुराने LJP नाम और ‘बंगला’ चिन्ह का अधिकार नहीं दिया था।

TMC मामले में अभी क्या स्थिति है?

TMC के मामले में भी फिलहाल तस्वीर कुछ ऐसी ही है। चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को कहा कि उसके सामने पार्टी के दो प्रतिद्वंद्वी गुट हैं—एक ममता बनर्जी के नेतृत्व में और दूसरा अरूप रॉय के नेतृत्व में। दोनों ही खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बता रहे हैं।

आयोग ने आगामी उपचुनावों को देखते हुए अंतरिम व्यवस्था लागू की है। दोनों गुटों को ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल और घास’ चिन्ह के इस्तेमाल से रोक दिया गया है। उन्हें अलग नाम और चुनाव आयोग की ओर से उपलब्ध स्वतंत्र चुनाव चिन्हों में से विकल्प चुनने को कहा गया है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि यह अंतिम फैसला नहीं है। TMC के मूल नाम और चुनाव चिन्ह पर किस गुट का दावा स्वीकार किया जाएगा, इसका अंतिम निर्धारण बाद की प्रक्रिया में होगा।

तीनों मामलों में क्या अंतर रहा?

शिवसेना मामले में आयोग ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर शिंदे गुट को पार्टी का नाम और धनुष-बाण चिन्ह दिया। LJP विवाद में दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह दिए गए। वहीं TMC मामले में फिलहाल दोनों गुटों के लिए मूल नाम और चिन्ह फ्रीज कर दिए गए हैं और अंतिम फैसला अभी बाकी है।

इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि पार्टी में विभाजन होने पर चुनाव आयोग का कदम मामले के तथ्यों, संगठनात्मक स्थिति, विधायी समर्थन और चुनावी समय-सीमा जैसी परिस्थितियों पर निर्भर कर सकता है।