देहरादून में 75 करोड़ खर्च, फिर भी जहरीली हवा बरकरार? Swachh Vayu Survey के आंकड़ों ने उठाए सवाल

कभी अपनी साफ हवा और प्राकृतिक खूबसूरती के लिए पहचाने जाने वाले देहरादून में Air Pollution अब गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। शहर की वायु गुणवत्ता में सुधार के दावे जरूर किए जा रहे हैं और Swachh Vayu Survey में देहरादून की रैंकिंग भी बेहतर हुई है, लेकिन दूसरी तरफ उपलब्ध आंकड़े यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या शहर की हवा वास्तव में सुरक्षित स्तर तक पहुंच पाई है?

सबसे बड़ा सवाल National Clean Air Programme (NCAP) के तहत देहरादून के लिए जारी और खर्च की गई राशि को लेकर भी है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, शहर में वायु प्रदूषण कम करने के लिए बड़ी रकम खर्च होने के बावजूद हवा अभी निर्धारित सुरक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाई है।

Swachh Vayu Survey में देहरादून की रैंकिंग बेहतर

Dehradun Air Quality Rank में सुधार जरूर दर्ज किया गया है। Swachh Vayu Survey में देहरादून 37वें स्थान से बढ़कर 12वें स्थान पर पहुंचा है। पहली नजर में यह बदलाव शहर के लिए अच्छी खबर दिखाई देता है।

लेकिन केवल रैंकिंग में सुधार को ही हवा की गुणवत्ता में पूर्ण सुधार का पैमाना मानना कितना उचित है, यह सवाल भी महत्वपूर्ण है। किसी शहर की रैंकिंग इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी तुलना किन अन्य शहरों से की जा रही है। ऐसे में देहरादून की बेहतर रैंकिंग के साथ वास्तविक Air Quality Data को भी देखना जरूरी है।

75 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च होने का दावा

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, National Clean Air Programme के तहत देहरादून के लिए करीब 90.09 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई थी। इसमें से लगभग 75.08 करोड़ रुपये खर्च किए जाने की जानकारी सामने आई है।

यह राशि शहर में वायु प्रदूषण कम करने और Air Quality Improvement से जुड़े उपायों पर खर्च की गई। हालांकि, सवाल यह है कि इतनी बड़ी रकम खर्च होने के बाद भी क्या देहरादून की हवा सुरक्षित स्तर तक पहुंच सकी है?

यही वजह है कि खर्च और वास्तविक परिणाम के बीच अंतर को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

PM10 में आई करीब 60 फीसदी गिरावट

वायु गुणवत्ता से जुड़े आंकड़ों पर नजर डालें तो देहरादून में PM10 के स्तर में पहले के मुकाबले कमी दर्ज हुई है। उपलब्ध PRANA Portal के 2018 के आंकड़ों में शहर में PM10 का स्तर करीब 250 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर बताया गया था।

हालिया आंकड़ों में यह स्तर करीब 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक आने की बात सामने आई है। यानी इस अवधि में PM10 के स्तर में लगभग 60 फीसदी की कमी दर्ज हुई।

यह निश्चित रूप से सुधार का संकेत है, लेकिन इसके बावजूद सवाल यह है कि क्या मौजूदा स्तर को सुरक्षित और संतोषजनक माना जा सकता है?

सुधार हुआ, लेकिन मंजिल अभी दूर?

यहां सबसे अहम बात यह है कि Pollution Reduction और Safe Air Quality एक ही चीज नहीं हैं। यदि प्रदूषण के स्तर में कमी आती है, तो यह सकारात्मक बदलाव है, लेकिन अंतिम लक्ष्य हवा को स्वास्थ्य के लिहाज से सुरक्षित स्तर तक लाना होना चाहिए।

देहरादून में PM10 के स्तर में कमी आने के बावजूद यदि हवा अभी भी निर्धारित मानकों से ऊपर बनी हुई है, तो केवल रैंकिंग में सुधार को पूरी सफलता मानना उचित नहीं होगा।

यही कारण है कि 75 करोड़ रुपये के खर्च और उसके वास्तविक असर का मूल्यांकन जरूरी हो जाता है।

कभी साफ हवा के लिए मशहूर था देहरादून

देहरादून की पहचान लंबे समय तक हरियाली, पहाड़ों और अपेक्षाकृत स्वच्छ वातावरण वाले शहर के रूप में रही है। तेजी से बढ़ता शहरीकरण, वाहनों की संख्या में वृद्धि, निर्माण कार्य, सड़क की धूल और बदलती मौसम परिस्थितियां शहर की Air Quality पर दबाव बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं।

ऐसे में केवल प्रदूषण कम करने के लिए बजट खर्च करना पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि उसका असर जमीन पर दिखाई दे और प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों को लगातार नियंत्रित किया जाए।

अब सवाल सिर्फ रैंकिंग का नहीं, साफ हवा का है

Swachh Vayu Survey में देहरादून का 37वें से 12वें स्थान पर पहुंचना निश्चित तौर पर एक सकारात्मक संकेत है। PM10 के स्तर में आई गिरावट भी सुधार की ओर इशारा करती है। लेकिन इसके साथ यह देखना भी जरूरी है कि शहर की हवा prescribed safety standards तक पहुंची या नहीं।

करीब 75 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद देहरादून की Air Quality में कितना स्थायी सुधार आया, किन योजनाओं पर कितना पैसा खर्च हुआ और उनका वास्तविक प्रभाव क्या रहा—इन सवालों के जवाब सार्वजनिक रूप से सामने आना जरूरी है।

आखिरकार किसी भी शहर की सफलता सिर्फ Survey Ranking से तय नहीं होनी चाहिए। असली कामयाबी तब होगी, जब देहरादून के लोगों को लंबे समय तक स्वच्छ और सुरक्षित हवा मिल सके।