Impact of the SIR on the names of 95,000 voters; find out what needs to be done after the final list is released.
Dehradun Voter Verification News: उत्तराखंड में प्रस्तावित Special Intensive Revision (SIR) से पहले आई प्री-SIR रिपोर्ट ने निर्वाचन विभाग की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक देहरादून, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जैसे शहरी और मैदानी जिलों में बड़ी संख्या में मतदाताओं का भौतिक सत्यापन अब भी अधूरा है। कई जगह बीएलओ को मतदाता अपने दर्ज पते पर नहीं मिले, जिससे मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया और चुनौतीपूर्ण हो गई है।
राजधानी देहरादून के कुछ विधानसभा क्षेत्रों में स्थिति ज्यादा चिंताजनक बताई जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार धर्मपुर, रायपुर और डोईवाला जैसे इलाकों में उल्लेखनीय संख्या में मतदाताओं का सत्यापन नहीं हो पाया। इससे निर्वाचन विभाग के सामने यह सवाल खड़ा हो गया है कि तेजी से बढ़ती शहरी आबादी, नए आवासीय क्लस्टर और लगातार होने वाले प्रवास के बीच मतदाता सूची को पूरी तरह सटीक कैसे बनाया जाए।
निर्वाचन विभाग के लिए सबसे बड़ी चुनौती उन इलाकों में सामने आ रही है जहां पिछले दो दशकों में आबादी तेजी से बढ़ी है। देहरादून और आसपास के क्षेत्रों में उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों से आकर बड़ी संख्या में लोग बसे हैं। इसी वजह से स्थायी और अस्थायी पते के सत्यापन, रिकॉर्ड मिलान और voter mapping का काम जटिल हो गया है।
रिपोर्ट में यह भी संकेत है कि नई कॉलोनियों, अपार्टमेंट्स और आवासीय सोसाइटी में डेटा मैपिंग की रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी रही। कई मामलों में मतदाता सूची में दर्ज पता और वास्तविक निवास के बीच अंतर मिला है। इस वजह से डोर-टू-डोर verification के दौरान बीएलओ को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
दूसरी ओर, पहाड़ी जिलों का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर बताया गया है। रुद्रप्रयाग और बागेश्वर जैसे जिलों में सत्यापन लगभग पूर्ण स्तर तक पहुंचा, जबकि चम्पावत, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, टिहरी और चमोली जैसे जिलों में भी प्रगति बेहतर रही। इससे साफ है कि शहरी और मैदानी क्षेत्रों की तुलना में पहाड़ी जिलों में electoral roll verification का काम ज्यादा व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ा है।
निर्वाचन विभाग अब अप्रैल में प्रस्तावित अंतिम SIR से पहले सत्यापन प्रक्रिया को तेज करने की कोशिश में जुटा है। विभाग का फोकस उन मतदाताओं की पहचान पर है जो अपने दर्ज पते पर नहीं मिले, जिनका डेटा अधूरा है या जिनकी एंट्री को दोबारा मिलान की जरूरत है। आने वाले दिनों में बीएलओ स्तर पर दोबारा संपर्क, दस्तावेजों का मिलान और स्थानीय स्तर पर डेटा अपडेट की प्रक्रिया और तेज हो सकती है।
यह पूरी स्थिति चुनाव आयोग के लिए केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि electoral accuracy से जुड़ा अहम मुद्दा भी है। यदि बड़ी संख्या में मतदाताओं का सत्यापन अधूरा रहता है, तो अंतिम मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। इसलिए प्री-SIR रिपोर्ट को एक चेतावनी संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जिसके आधार पर विभाग अब अपनी रणनीति को और सख्त कर सकता है।