The grounds of Devidhura will resound once again on August 28; find out why the Bagwal battle takes place on Raksha Bandhan.
Bagwal War on Raksha Bandhan: उत्तराखंड के चंपावत स्थित देवीधुरा में रक्षाबंधन के दिन सदियों पुरानी बग्वाल युद्ध परंपरा एक बार फिर देखने को मिलेगी। 28 अगस्त को खोलीखाड़ दुर्वाचौड़ मैदान में चार खामों के रणबांकुरे आमने-सामने होंगे। इस अनोखी परंपरा का इतिहास बेहद रोचक है। मान्यता है कि कभी यहां मां वाराही देवी को प्रसन्न करने के लिए नरबलि (Human Sacrifice) दी जाती थी। समय के साथ इस परंपरा का स्वरूप बदला और अब बग्वाल में पत्थरों की जगह फल-फूलों का इस्तेमाल किया जाता है।
रक्षाबंधन पर फिर सजने लगा बग्वाल का मैदान
देवीधुरा में होने वाले Bagwal Festival 2026 की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इस वर्ष 13 दिवसीय बग्वाल मेले का आयोजन 23 अगस्त से 4 सितंबर तक किया जा रहा है। मेले का शुभारंभ रविवार को कैबिनेट मंत्री राम सिंह कैड़ा और जिला पंचायत अध्यक्ष आनंद सिंह अधिकारी ने किया।
हनुमान मंदिर से मां वाराही मंदिर परिसर तक स्कूली बच्चों ने झांकी निकाली। वहीं, खोलीखाड़ दुर्वाचौड़ मैदान में 28 अगस्त को होने वाले ऐतिहासिक बग्वाल युद्ध को लेकर भी तैयारियां तेज कर दी गई हैं।
चार खामों के बीच होता है अनोखा युद्ध
देवीधुरा की Bagwal Tradition में चार प्रमुख खामें हिस्सा लेती हैं। इनमें चम्याल, गहड़वाल, वालिक और लमगड़िया खाम शामिल हैं। मैदान के एक छोर से चम्याल और गहड़वाल खाम के लोग तथा दूसरे छोर से वालिक और लमगड़िया खाम के रणबांकुरे बग्वाल में उतरते हैं।
इस दौरान प्रतिभागी पारंपरिक साफे और रिंगाल से बनी ढाल लेकर मैदान में पहुंचते हैं। अलग-अलग खामों की पहचान उनके साफों के रंग से भी होती है। गहड़वाल खाम के लोग केसरिया, चम्याल गुलाबी, वालिक सफेद और लमगड़िया खाम के लोग पीले साफे पहनते हैं।
कभी पत्थरों से बहाया जाता था खून
बग्वाल की सबसे खास बात इसका पुराना स्वरूप है। वर्ष 2013 से पहले तक चारों खामों के लोग एक-दूसरे पर पत्थरों की बौछार करते थे। मान्यता थी कि जब एक व्यक्ति के बराबर रक्त बह जाता था, तब बग्वाल रोक दी जाती थी।
इसके बाद मंदिर के पुजारी मैदान में पहुंचकर बग्वाल समाप्त कराते थे और चारों खामों के लोग एक-दूसरे से गले मिलकर कुशलक्षेम पूछते थे। हालांकि, बाद में अदालत के निर्देशों के बाद इस परंपरा में बदलाव किया गया और पत्थरों की जगह फल और फूलों से बग्वाल खेलने की व्यवस्था शुरू हुई।
क्या है नरबलि से जुड़ी कहानी?
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बग्वाल शुरू होने से पहले देवीधुरा में मां वाराही को प्रसन्न करने के लिए नरबलि की प्रथा थी। एक लोककथा के मुताबिक, जब चम्याल खाम की एक वृद्धा के इकलौते पौत्र की बलि देने की बारी आई तो उसने अपने वंश को बचाने के लिए मां वाराही की कठिन तपस्या की।
मान्यता है कि देवी ने वृद्धा की तपस्या से प्रसन्न होकर मानव बलि के बजाय एक व्यक्ति के बराबर रक्त बहने की शर्त स्वीकार की। इसके बाद चारों खामों के बीच बग्वाल खेलने की परंपरा शुरू हुई। इसी धार्मिक मान्यता को आज भी इस परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
अब बग्वाल बनी सामाजिक सद्भाव की पहचान
समय के साथ देवीधुरा की बग्वाल केवल धार्मिक आयोजन नहीं रही, बल्कि Social Harmony और सांस्कृतिक एकता की पहचान भी बन गई है। अलग-अलग सामाजिक समूहों से जुड़े लोग चार खामों के रूप में एक साथ इस परंपरा में हिस्सा लेते हैं।
बग्वाल खत्म होने के बाद प्रतिभागियों का एक-दूसरे से मिलना और कुशलक्षेम पूछना इस परंपरा के सामाजिक पक्ष को भी दर्शाता है। यही वजह है कि हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक इस अनोखे आयोजन को देखने देवीधुरा पहुंचते हैं।
बग्वाल में शामिल होने के लिए करनी पड़ती है खास तैयारी
बग्वाल में हिस्सा लेने वाले Ranbankure आयोजन से पहले विशेष तैयारियां करते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार प्रतिभागियों को करीब एक पखवाड़े पहले से खान-पान और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। मैदान में सुरक्षा के लिए ढाल और अन्य पारंपरिक साधनों का इस्तेमाल किया जाता है।
बग्वाल के दौरान एक दल द्वारा फेंके गए फल, फूल या अन्य निर्धारित सामग्री को ढाल से बचाते हुए दूसरी ओर वापस फेंकना इस परंपरा का हिस्सा है।
आषाढ़ी कौतिक के नाम से भी मशहूर है मेला
देवीधुरा का यह आयोजन Aashadhi Kautik के नाम से भी जाना जाता है। बग्वाल मेले के दौरान धार्मिक अनुष्ठानों के साथ उत्तराखंड की लोक कला और संस्कृति की झलक भी देखने को मिलती है। देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु और पर्यटक इस ऐतिहासिक आयोजन को देखने पहुंचते हैं।
इस तरह कभी खून बहाने वाली परंपरा के रूप में पहचानी जाने वाली देवीधुरा की बग्वाल अब बदलते समय के साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान को कायम रखते हुए Religious Tradition, Folk Culture और Social Harmony का अनोखा उदाहरण बन चुकी है।