Same book, two prices! Why are questions being raised about the education system in Uttarakhand?
उत्तराखंड में school textbooks की कीमतों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि Uttarakhand School Education Department द्वारा प्रकाशित कई किताबें NCERT books की तुलना में 80 फीसदी तक महंगी बेची जा रही हैं, जबकि उनमें से कुछ का content लगभग पूरी तरह एक जैसा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कई मामलों में सिर्फ cover design बदला गया है, लेकिन अंदर का पाठ्यक्रम और अध्याय NCERT pattern पर ही आधारित हैं। इसके बावजूद कीमतों में 35 से 53 रुपये तक का अंतर देखने को मिल रहा है।
एक ही किताब, लेकिन दाम में बड़ा अंतर
बाजार में उपलब्ध किताबों की तुलना करने पर यह अंतर साफ नजर आता है। उदाहरण के तौर पर, कक्षा 1 की NCERT English book ‘Mridang’ जहां 65 रुपये में उपलब्ध है, वहीं लगभग समान 119-page वाली उत्तराखंड शिक्षा विभाग की किताब 100 रुपये में बेची जा रही है।
इसी तरह कक्षा 6 विज्ञान की राज्य सरकार से प्रकाशित किताब की कीमत 118 रुपये बताई जा रही है। यानी, same syllabus और लगभग समान page count होने के बावजूद अभिभावकों को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है।
सवालों के घेरे में ‘Alternative Books Model’
उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों से NCERT books के विकल्प के रूप में राज्य सरकार अपनी किताबें भी उपलब्ध करा रही है। आधिकारिक तौर पर इन्हें alternative textbooks के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन अब यही मॉडल सवालों के घेरे में है।
अभिभावकों का कहना है कि जब बाजार में NCERT textbooks पहले से उपलब्ध हैं, तो फिर राज्य सरकार की ओर से इतनी महंगी किताबें छापने की जरूरत क्या थी? और अगर कंटेंट लगभग समान है, तो कीमतों में इतना बड़ा अंतर क्यों है?
यही सवाल अब public accountability और education transparency के मुद्दे से जुड़ गया है।
Parents का आरोप: स्कूलों पर डाला जा रहा दबाव
इस पूरे विवाद को और गंभीर बना रहा है वह आरोप, जिसमें कहा जा रहा है कि कुछ स्कूलों को NCERT books के बजाय Uttarakhand School Education की किताबें खरीदने के लिए प्रेरित या दबाव में लाया जा रहा है।
कई अभिभावकों का कहना है कि उन्होंने पहले ही NCERT set खरीद लिया था, लेकिन बाद में स्कूल की ओर से कहा गया कि बच्चों को राज्य सरकार द्वारा प्रकाशित किताबें ही लेनी होंगी। इससे अभिभावकों पर अतिरिक्त financial burden पड़ रहा है।
अगर यह आरोप सही साबित होते हैं, तो मामला सिर्फ price difference का नहीं, बल्कि forced purchase model का भी बन सकता है।
‘हिन्दुस्तान’ की पड़ताल में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य
किताबों की price comparison, page count, और chapter structure की जांच में यह बात सामने आई कि कई किताबों में NCERT content और राज्य की किताबों के बीच बेहद कम अंतर है। कुछ विषयों में सिर्फ मामूली बदलाव या localized adaptation दिखाई देती है, लेकिन अधिकांश पाठ्यक्रम पहले जैसा ही है।
इसके बावजूद, किताबों की कीमतों में बड़ा अंतर होना अभिभावकों और शिक्षा जगत के लिए चिंता का विषय बन गया है।
सबसे ज्यादा अंतर गणित और बुनियादी विषयों की किताबों में
जानकारी के मुताबिक, price gap सबसे अधिक Mathematics और कुछ बुनियादी विषयों की किताबों में देखने को मिल रहा है। इससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि क्या printing cost और paper quality के नाम पर जरूरत से ज्यादा कीमत तय की गई है।
अभिभावकों का तर्क है कि अगर एक सरकारी एजेंसी NCERT कम कीमत में वही किताब उपलब्ध करा सकती है, तो फिर राज्य स्तर पर लागत इतनी ज्यादा कैसे हो गई?
शासन तक पहुंचा मामला, जांच के संकेत
यह मामला अब प्रशासनिक स्तर तक पहुंच चुका है। रिपोर्ट्स के अनुसार, खबर सामने आने के बाद Director General Deepti Singh ने कहा है कि इस पूरे प्रकरण की जांच कराई जाएगी।
उन्होंने संकेत दिए हैं कि Chief Education Officer Nainital और SCERT Director से रिपोर्ट मांगी जा सकती है। जांच में यह पता लगाने की कोशिश होगी कि आखिर printing cost, paper quality, royalty payment, या अन्य कौन से कारण हैं, जिनकी वजह से राज्य की किताबें NCERT से कहीं ज्यादा महंगी हो गईं।
शिक्षा विभाग का तर्क: Printing Cost, Quality और Royalty
विवाद के बीच शिक्षा विभाग की ओर से सफाई भी दी गई है। विभाग का कहना है कि कई बार NCERT पर्याप्त संख्या में किताबें उपलब्ध नहीं करा पाता, इसलिए राज्य को अपनी किताबें छपवानी पड़ती हैं।
विभाग के अनुसार, paper quality, printing charges, tender process, और royalty payment जैसे कारणों की वजह से राज्य सरकार की किताबों की लागत अधिक हो जाती है।
हालांकि, सवाल यह है कि अगर यही कारण हैं, तो फिर price transparency और cost breakup सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?
प्राइवेट स्कूलों की महंगी किताबों के बीच अब सरकारी किताबें भी बोझ
पहले से ही private publishers की महंगी किताबों से परेशान अभिभावकों के लिए अब सरकारी किताबें भी चिंता का कारण बन रही हैं। आमतौर पर लोग यह मानते हैं कि सरकारी किताबें सस्ती और सुलभ होंगी, लेकिन इस मामले ने उस धारणा को झटका दिया है।
यानी, जहां एक तरफ निजी स्कूलों पर book pressure के आरोप लगते रहे हैं, वहीं अब government textbook pricing भी बहस का मुद्दा बन गया है।
किसे हो रहा फायदा? यही सबसे बड़ा सवाल
पूरा विवाद अब एक अहम सवाल पर आकर टिक गया है—अगर same curriculum और लगभग समान कंटेंट वाली किताबें ज्यादा कीमत पर बेची जा रही हैं, तो इससे फायदा आखिर किसे हो रहा है?
क्या यह सिर्फ administrative inefficiency है?
या फिर इसके पीछे procurement model, printing contracts, और संभावित commission allegations जैसे बड़े सवाल छिपे हैं?
यही वजह है कि यह मामला अब सिर्फ किताबों की कीमत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि education governance और public spending accountability का मुद्दा बन गया है।
Uttarakhand school books controversy ने शिक्षा व्यवस्था में cost transparency, fair pricing, और parental rights जैसे कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। जब NCERT की किताबें कम कीमत पर उपलब्ध हैं और पाठ्यक्रम लगभग एक जैसा है, तो राज्य सरकार की किताबों के महंगे होने का जवाब सिर्फ “quality” और “cost” से नहीं दिया जा सकता।
अब सबकी नजर संभावित जांच पर है। अगर इस मामले में स्पष्ट जवाब नहीं आए, तो यह विवाद आने वाले समय में और बड़ा रूप ले सकता है।