BJP के खिलाफ नाराजगी, लेकिन कांग्रेस कमजोर, उत्तराखंड में 2027 का चुनाव क्यों होगा दिलचस्प?

उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज होने लगी है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की कोशिश करेगी, जबकि कांग्रेस सरकार में वापसी की उम्मीद लगाए बैठी है। हालांकि, राज्य की राजनीतिक परिस्थितियां दोनों दलों के लिए अलग-अलग चुनौतियां पेश कर रही हैं। एक तरफ पुष्कर सिंह धामी सरकार के सामने सत्ता विरोधी माहौल, भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, भूमि कानून और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दे हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस अब तक इन मुद्दों को व्यापक जनसमर्थन में बदलने और मजबूत नेतृत्व पेश करने में संघर्ष करती दिखाई दे रही है।

राजनीतिक विश्लेषण के मुताबिक, BJP का वोट शेयर घटने के बावजूद वह विधानसभा में बहुमत हासिल कर सकती है। वहीं, कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत पाने के लिए BJP के मुकाबले कहीं बड़ा चुनावी बदलाव लाना पड़ सकता है।

अंकिता भंडारी केस से बढ़ी राजनीतिक चुनौती

उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। 14 अक्टूबर को अंकिता के माता-पिता ने दिल्ली के इंडिया गेट पर BJP नेता दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किए जाने के विरोध में प्रदर्शन किया था। परिवार ने आरोप लगाया कि गौतम का इस मामले से संबंध है और उनकी नियुक्ति वापस ली जानी चाहिए, जब तक कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की जांच पूरी नहीं हो जाती।

हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गौतम को अंकिता हत्याकांड से जुड़े मामलों में आरोपी नहीं बनाया गया है। अंकिता के माता-पिता का दावा है कि जिस ‘VIP’ मेहमान के लिए कथित तौर पर विशेष सेवाएं देने का दबाव बनाया गया था, वह गौतम थे। गौतम इन आरोपों के संदर्भ में मामले में आरोपी नहीं हैं। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने भी राज्यपाल की नियुक्ति पर सवाल उठाए हैं।

सितंबर 2022 में 19 वर्षीय अंकिता ऋषिकेश के पास एक रिजॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करती थीं। आरोप है कि मेहमानों को विशेष सेवाएं देने के दबाव का विरोध करने पर रिजॉर्ट मालिक और उसके दो कर्मचारियों ने उन्हें चीला नहर में धकेल दिया था। इस मामले में तीनों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है।

अंकिता का मामला BJP के लिए खास तौर पर संवेदनशील है, क्योंकि उनका संबंध पौड़ी गढ़वाल जिले से था। इस मुद्दे पर पहाड़ी क्षेत्रों में पहले भी व्यापक विरोध देखने को मिला था। ऐसे में यह मामला आगामी चुनाव में स्थानीय नाराजगी को प्रभावित कर सकता है।
क्या उत्तराखंड में BJP लगा पाएगी जीत की हैट्रिक?
साल 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड में लंबे समय तक हर पांच साल में सरकार बदलने का रुझान रहा। 2022 के विधानसभा चुनाव में BJP ने यह परंपरा तोड़ दी। पार्टी ने 70 में से 47 सीटें जीतकर 44.74 प्रतिशत वोट हासिल किए और लगातार दूसरी बार सरकार बनाई।

अब BJP के सामने लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की चुनौती है। पार्टी हरियाणा और असम में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने में सफल रही है, लेकिन उत्तराखंड की परिस्थितियां इन दोनों राज्यों से अलग हैं।

हरियाणा में BJP का वोट शेयर 2014 में 33.34 प्रतिशत से बढ़कर 2019 में 36.69 प्रतिशत और 2024 में 40.10 प्रतिशत हो गया। असम में भी पार्टी का वोट शेयर 2016 के 29.84 प्रतिशत से बढ़कर 2021 में 33.66 प्रतिशत और 2026 में 38.29 प्रतिशत तक पहुंचा।

इसके उलट उत्तराखंड में 2017 से 2022 के बीच BJP के वोट शेयर में दो प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई, जबकि कांग्रेस का वोट शेयर चार प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा। इसलिए राज्य में BJP की लगातार तीसरी जीत का रास्ता हरियाणा और असम जितना आसान नहीं माना जा सकता।

धामी सरकार के सामने सत्ता विरोधी माहौल की चुनौती

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पांच साल से अधिक समय से राज्य की सत्ता में हैं। ऐसे में सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी भावना चुनाव में अहम भूमिका निभा सकती है।

सितंबर 2025 में सामने आए भर्ती परीक्षा पेपर लीक मामले और उसके बाद दोबारा परीक्षा कराने में हुई देरी ने सरकार के सामने चुनौती खड़ी की। नियमित भर्ती प्रक्रिया की मांग के साथ-साथ मूल निवास और भूमि कानून जैसे मुद्दे भी लगातार उठाए जा रहे हैं।

फरवरी 2025 में विधानसभा ने संशोधित और सख्त भूमि कानून पारित किया था। हालांकि, मूल निवास भू-कानून समन्वय संघर्ष समिति ने इस कानून को जनता के साथ धोखा बताया। समिति का कहना है कि शहरी क्षेत्रों को प्रतिबंधों से बाहर रखने के कारण कानून का उद्देश्य पूरी तरह पूरा नहीं होता, जबकि इन क्षेत्रों में जमीन की कीमतें अधिक हैं।

इसी तरह उत्तराखंड एकता मंच गढ़वाली और कुमाऊंनी समुदायों को जनजाति का दर्जा देने तथा संविधान की पांचवीं अनुसूची से जुड़े प्रावधानों की मांग उठा रहा है। मंच का तर्क है कि इससे पहाड़ी युवाओं को आरक्षण और अन्य संवैधानिक लाभ मिल सकते हैं, साथ ही जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय लोगों के अधिकार मजबूत हो सकते हैं।

राज्य में आपदा राहत में देरी और मानव-वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती घटनाएं भी सरकार के सामने सवाल खड़े कर रही हैं।

लोकसभा और विधानसभा चुनाव के वोट शेयर में कितना अंतर?

उत्तराखंड में पिछले चुनावों के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि लोकसभा चुनाव की तुलना में बाद में होने वाले विधानसभा चुनाव में BJP का वोट शेयर घटता रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को 61.66 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में यह घटकर 44.74 प्रतिशत रह गया। यानी लगभग तीन साल के भीतर करीब 17 प्रतिशत अंकों की गिरावट दर्ज हुई।

इसी अवधि में कांग्रेस का वोट शेयर 31.74 प्रतिशत से बढ़कर 38.26 प्रतिशत हो गया। यह छह प्रतिशत अंकों से अधिक की वृद्धि थी।

2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड में BJP को 57.50 प्रतिशत और कांग्रेस को 33.07 प्रतिशत वोट मिले थे। अगर 2024 से 2027 के बीच वोट शेयर में 2019 से 2022 जैसा बदलाव होता है, तो अनुमान के मुताबिक BJP का वोट शेयर लगभग 41.7 प्रतिशत और कांग्रेस का करीब 39.9 प्रतिशत हो सकता है। इस स्थिति में दोनों दलों के बीच अंतर लगभग दो प्रतिशत अंकों का रह जाएगा।

हालांकि, यह केवल पिछले चुनावों पर आधारित एक अनुमान है। वास्तविक नतीजे मतदाताओं के रुझान, उम्मीदवारों, स्थानीय मुद्दों और चुनावी गठजोड़ जैसे कारकों पर निर्भर करेंगे।

वोट शेयर घटने पर भी BJP कैसे जीत सकती है?

किसी पार्टी का राज्यव्यापी वोट शेयर सीधे यह तय नहीं करता कि उसे कितनी विधानसभा सीटें मिलेंगी। चुनावी नतीजों में यह अहम होता है कि वोट किन निर्वाचन क्षेत्रों में और किस अंतर से मिलते हैं।

2022 के विधानसभा चुनाव में BJP को 44.74 प्रतिशत और कांग्रेस को 38.26 प्रतिशत वोट मिले थे। दोनों दलों के बीच 6.48 प्रतिशत अंकों का अंतर था। यदि 2022 के परिणामों को आधार बनाकर यह मान लिया जाए कि हर सीट पर वोटों में समान बदलाव होता है, तो इसे ‘यूनिफॉर्म स्विंग’ कहा जाता है।

इस गणित के मुताबिक, यदि BJP और कांग्रेस के बीच अंतर घटकर करीब दो प्रतिशत अंक रह जाता है, तब भी 2022 के परिणामों पर आधारित अनुमान में BJP लगभग 43 सीटों पर आगे रह सकती है। राज्य में बहुमत के लिए 36 सीटों की जरूरत होती है।

यहां तक कि दोनों दलों का वोट शेयर बराबर होने की स्थिति में भी 2022 के सीटवार परिणामों पर आधारित गणना BJP को करीब 38 सीटें देती है। इसका कारण यह है कि BJP ने कई सीटें कम अंतर से जीती थीं, जबकि कांग्रेस ने अपनी कुछ सीटें बड़े अंतर से हासिल की थीं।

इसलिए कांग्रेस को केवल वोट शेयर में अंतर कम करना पर्याप्त नहीं होगा। 2022 के आंकड़ों पर आधारित अनुमान के अनुसार, स्पष्ट बहुमत पाने के लिए उसे BJP से लगभग पांच प्रतिशत अंकों की बढ़त हासिल करनी पड़ सकती है। हालांकि, यह गणना इस धारणा पर आधारित है कि सभी सीटों पर वोटों का रुझान लगभग एक समान रहेगा। पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में अलग-अलग बदलाव होने पर नतीजे काफी बदल सकते हैं।

कांग्रेस के सामने नेतृत्व और संगठन की चुनौती

उत्तराखंड में कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक मजबूत और सर्वमान्य नेतृत्व की कमी बताई जा रही है। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल 2022 के विधानसभा चुनाव में श्रीनगर सीट से 587 वोटों के अंतर से हार गए थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें गढ़वाल सीट पर BJP के अनिल बलूनी से भी हार का सामना करना पड़ा।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत कांग्रेस के सबसे पहचाने जाने वाले नेताओं में शामिल हैं, लेकिन उनके राजनीतिक भविष्य और पार्टी के भीतर उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। लेख में दिए गए विवरण के अनुसार, 1 अक्टूबर को उत्तराखंड की पार्टी प्रभारी कुमारी शैलजा ने रावत को ऐसी यात्रा रोकने के लिए पत्र लिखा था, जिसकी योजना पार्टी के साथ चर्चा किए बिना बनाई गई थी। इसके बावजूद रावत ने 5 अक्टूबर को जसपुर से यात्रा शुरू की। बाद में उन्होंने दिल्ली जाकर अपना पक्ष रखा और पार्टी कार्यक्रमों में शामिल होने की बात कही।

2022 के विधानसभा चुनाव में हरीश रावत और तत्कालीन कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रीतम सिंह के बीच मतभेदों को पार्टी की हार की वजहों में गिना गया था। यदि आगामी चुनाव से पहले भी गुटबाजी बनी रहती है, तो कांग्रेस के लिए राज्यव्यापी समर्थन जुटाना मुश्किल हो सकता है।

जनहित के मुद्दों पर कांग्रेस से आगे दूसरे संगठन

कांग्रेस ने 2025 के पेपर लीक मामले में CBI जांच की मांग को लेकर राज्यभर में धरना-प्रदर्शन किए थे। हालांकि, इस आंदोलन में बेरोजगार युवाओं के नेता बॉबी पंवार प्रमुख चेहरा बनकर उभरे। इसी तरह भूमि कानून, मूल निवास और जनजाति का दर्जा देने से जुड़े मुद्दों पर मूल निवास भू-कानून समन्वय संघर्ष समिति और उत्तराखंड एकता मंच सक्रिय रहे।

इससे कांग्रेस के सामने यह चुनौती पैदा होती है कि सरकार के खिलाफ मौजूद नाराजगी को अपने पक्ष में कैसे बदला जाए। केवल मुद्दों का समर्थन करना पर्याप्त नहीं होगा; पार्टी को इन मांगों को व्यापक चुनावी अभियान से जोड़ना भी होगा।

संगठन के स्तर पर भी पार्टी को झटका लगा। जनवरी 2025 के निकाय चुनाव में कांग्रेस राज्य के 11 नगर निगमों में से किसी में भी जीत दर्ज नहीं कर पाई। हल्द्वानी में भी पार्टी का महापौर प्रत्याशी BJP से हार गया, जबकि विधानसभा सीट कांग्रेस के पास है।

लोकसभा चुनाव में BJP का प्रदर्शन अब भी मजबूत

इन चुनौतियों के बावजूद उत्तराखंड में BJP का आधार पूरी तरह कमजोर हुआ हो, ऐसा स्पष्ट नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनाव में हिंदी भाषी राज्यों में पार्टी के वोट शेयर में गिरावट दर्ज हुई, लेकिन उत्तराखंड में यह गिरावट अपेक्षाकृत कम रही।

2019 की तुलना में BJP का वोट शेयर हिमाचल प्रदेश में 13 प्रतिशत अंकों से अधिक, हरियाणा में करीब 12 अंक, राजस्थान में नौ अंक और उत्तर प्रदेश में आठ अंक घटा। उत्तराखंड में गिरावट चार प्रतिशत अंकों से कुछ अधिक रही।

यह आंकड़ा संकेत देता है कि राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का असर बना हुआ है। हालांकि, लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री के नेतृत्व और विधानसभा चुनाव में स्थानीय सरकार के प्रदर्शन का महत्व अलग-अलग हो सकता है।

कांग्रेस के लिए एक और मुश्किल यह है कि 2022 में उसके वोट शेयर में हुई बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा बहुजन समाज पार्टी और निर्दलीय उम्मीदवारों के वोट घटने से आया था। इन दोनों का संयुक्त वोट शेयर 2017 के लगभग 17 प्रतिशत से घटकर 2022 में करीब 10.5 प्रतिशत रह गया था। ऐसे में कांग्रेस को 2027 में और बढ़त हासिल करने के लिए BJP समर्थक मतदाताओं के बीच भी सेंध लगानी पड़ सकती है।

पहाड़ी सीटों पर बदल सकता है चुनावी गणित

BJP के लिए सबसे बड़ा जोखिम यह है कि पहाड़ी क्षेत्रों में स्थानीय नाराजगी राज्यव्यापी वोट शेयर के अनुमान से ज्यादा सीटों को प्रभावित कर सकती है। जुलाई 2024 में लोकसभा चुनाव के कुछ ही सप्ताह बाद कांग्रेस ने उत्तराखंड की दोनों विधानसभा उपचुनाव सीटें जीत ली थीं। उसने मंगलौर सीट BSP से छीनी और बदरीनाथ सीट पर BJP को हराकर जीत दर्ज की।

2022 में BJP की कुछ जीत बेहद कम अंतर से हुई थीं। पौड़ी जिले की श्रीनगर सीट पर जीत का अंतर लगभग 0.9 प्रतिशत अंक था, जबकि कोटद्वार में यह करीब 4.8 प्रतिशत अंक रहा। यदि पहाड़ी क्षेत्रों में सरकार के खिलाफ नाराजगी बढ़ती है, तो ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों में मुकाबला बदल सकता है।

राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष, आपदा राहत, भूमि कानून और जनजाति के दर्जे जैसे मुद्दे स्थानीय मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं। BJP ने भी कम अंतर वाली सीटों पर विशेष ध्यान देने के लिए अपने सांसदों और विधायकों को अतिरिक्त जिम्मेदारियां सौंपी हैं।

अंकिता भंडारी केस और स्थानीय नाराजगी BJP के लिए अहम

अंकिता भंडारी हत्याकांड का मुद्दा BJP के लिए इसलिए भी संवेदनशील है, क्योंकि यह पहाड़ी क्षेत्र के लोगों की भावनाओं और न्याय की मांग से जुड़ा है। अक्टूबर 2022 में अंकिता के मामले में CBI जांच की मांग को लेकर उत्तराखंड क्रांति दल ने राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया था। पौड़ी जिले में बंद का व्यापक असर देखने को मिला था। इसके बावजूद BJP ने 2022 के विधानसभा चुनाव में जिले की सभी छह सीटें जीती थीं।

आगामी चुनाव में यह देखना अहम होगा कि क्या अंकिता केस, भूमि कानून, पेपर लीक और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसे मुद्दे पहाड़ी क्षेत्रों में एक साथ राजनीतिक असर डालते हैं। यदि ऐसा हुआ, तो BJP को कुछ सीटों पर राज्यव्यापी वोट शेयर के अनुमान से अधिक नुकसान हो सकता है।

फिर भी कांग्रेस के सामने चुनौती कम नहीं है। उसे स्थानीय असंतोष को राज्यभर में चुनावी समर्थन में बदलने के लिए एकजुट नेतृत्व, मजबूत संगठन और स्पष्ट अभियान की जरूरत होगी। 2022 के नतीजों पर आधारित गणित BJP को शुरुआती बढ़त देता है, लेकिन पहाड़ी सीटों पर बड़ा बदलाव इस समीकरण को बदल सकता है।

कुल मिलाकर, उत्तराखंड में 2027 का चुनाव केवल BJP के वोट शेयर में गिरावट या कांग्रेस की संभावित बढ़त से तय नहीं होगा। असली सवा