Landslide and debris devastation in Uttarkashi: Warning for Harshil in scientific report
उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में पांच अगस्त 2025 को धराली क्षेत्र में खीरगंगा (खेरा गाड) से आए 2,50,885 टन मलबे ने भारी तबाही मचाई। इस आपदा ने न केवल भूस्खलन और बाढ़ का रूप लिया, बल्कि छोटे पैमाने पर लैंडस्लाइड डेम आउटबर्स्ट फ्लड (LLOF) भी उत्पन्न हुए। विशेषज्ञों ने चेताया है कि हर्षिल क्षेत्र अभी भी जोखिम में है और आगे सतर्कता जरूरी है।
वैज्ञानिक समिति की रिपोर्ट
सचिव आईटी नितेश झा के निर्देश पर गठित वैज्ञानिक समिति ने आपदा की पहली वैज्ञानिक रिपोर्ट प्रस्तुत की है। इस समिति में यूकॉस्ट, आईआईआरएस और वाडिया के वैज्ञानिक शामिल थे। समिति ने लिडार सर्वे, एनडीआरएफ-एसडीआरएफ के ड्रोन सर्वे, स्थानीय लोगों से बातचीत और सैटेलाइट अध्ययन के आधार पर रिपोर्ट तैयार की।
समिति ने स्पष्ट किया कि आपदा का मुख्य कारण ऊपरी इलाकों में अत्यधिक बारिश और भूस्खलन डेम का टूटना था।
कैसे हुआ मलबा बहाव
उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में 4000 मीटर से ऊपर अत्यधिक वर्षा हुई, जिससे मिट्टी की ताकत कम हो गई।
पानी के दबाव और ढलानों की संरचना में असंतुलन के कारण भूस्खलन तेज़ हुआ।
धराली में मलबे का प्रवाह 5000 मीटर की ऊंचाई से शुरू होकर 2570 मीटर तक आया।
“मलबे और खड़ी ढलानों के कारण प्रवाह में और तेजी आई। इस घटना ने जलवायु परिवर्तन और भारी वर्षा के जोखिम को उजागर किया है।” – वैज्ञानिक समिति
लिडार सर्वे का निष्कर्ष
लिडार सर्वे और क्षेत्र निरीक्षण में यह पाया गया कि धराली क्षेत्र में मलबा फैन का क्षेत्रफल 0.74 वर्ग किलोमीटर से घटकर 0.151 वर्ग किलोमीटर रह गया। मलबे की कुल मात्रा 2,50,885 टन दर्ज की गई।
एनडीआरएफ, एनआईएम और सेना की तिरंगा टीम ने सर्वे में सहयोग दिया।
बारिश का ऐतिहासिक आंकड़ा
वैज्ञानिकों ने पिछले 124 वर्षों (1901-2024) का आंकड़ा भी देखा।
मानसून सीजन में वर्षा में 0.57 मिमी प्रति वर्ष वृद्धि दर्ज हुई।
प्री-मानसून में भी वर्षा की तीव्रता बढ़ी है।
समिति के अनुसार, यह आपदा जलवायु परिवर्तन और बढ़ती भारी वर्षा का परिणाम थी। भविष्य में ऐसे CIDF (Climate-Induced Debris Flow) की घटनाओं की संभावना अधिक है, जिससे पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन और मलबे का खतरा बना रहेगा।
हर्षिल क्षेत्र में खतरा
हर्षिल भी ऊंचाई वाले ढलानों पर स्थित है, इसलिए विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि भविष्य में मलबे और भूस्खलन का जोखिम यहां भी बना हुआ है। स्थानीय प्रशासन और वैज्ञानिक सतर्क हैं, लेकिन सुरक्षा उपायों की जरूरत है।
धराली आपदा ने दिखाया कि भारी वर्षा और जलवायु परिवर्तन किस तरह पहाड़ी इलाकों में अचानक प्राकृतिक आपदा उत्पन्न कर सकते हैं। मलबे का बहाव, डेम टूटना और तेजी से आने वाली बाढ़ ने क्षेत्रवासियों और प्रशासन के लिए गंभीर चेतावनी दी है।