“1 घंटे में बदल सकती है किस्मत”: यमन में मौत की सजा झेल रही भारतीय नर्स निमिषा प्रिया के लिए आखिरी उम्मीद बची है ब्लड मनी

एक भारतीय महिला, एक विदेशी ज़मीन, और अब मौत की घड़ी सिर पर… यमन की जेल में बंद नर्स निमिषा प्रिया की कहानी सिर्फ एक हत्या केस नहीं, बल्कि इंसाफ, संस्कृति और उम्मीद की जंग बन गई है।

16 जुलाई 2024, वो तारीख है जब निमिषा को फांसी दी जानी है। लेकिन, सजा-ए-मौत से ठीक एक घंटा पहले भी उसकी जान बच सकती है – अगर यमनी नागरिक मेहदी के परिवार वाले ब्लड मनी स्वीकार कर लें और माफ़ी दे दें।

 क्या है ब्लड मनी?

यमन की शरीया आधारित न्याय प्रणाली में मौत के बदले मौत का कानून चलता है। लेकिन, अगर पीड़ित का परिवार चाहे तो ब्लड मनी (दिया) लेकर दोषी को माफ कर सकता है।
ब्लड मनी = आर्थिक मुआवजा + कानूनी क्षमा

 कितना ऑफर किया गया है?

Save Nimisha Priya International Action Council की ओर से मेहदी के परिवार को $1 मिलियन (लगभग ₹8.6 करोड़) का ऑफर दिया गया है।
पॉवर ऑफ अटॉर्नी के तहत सैमुअल जेरोम यमन में रहकर बातचीत कर रहे हैं।

एक्टिविस्ट बाबू जॉन के अनुसार:

“अगर परिवार अंतिम क्षण में भी माफ कर दे, तो फांसी टाली जा सकती है।”

 जेल में भी सेवा में लगी है निमिषा

निमिषा सिर्फ एक अपराधी नहीं, वह जेल में भी एक प्रोफेशनल मेडिकल नर्स की भूमिका निभा रही है और कैदियों की सेवा कर रही है। इस पहलू ने उसकी मानवता और चरित्र को और मजबूती दी है।

 भारत सरकार की भूमिका क्या रही?

भारत सरकार ने वकील की नियुक्ति की थी

लेकिन यमन की सुप्रीम जुडिशियल काउंसिल और राष्ट्रपति दोनों ने सजा बरकरार रखी

अब आखिरी विकल्प है – राजनीतिक और मानवीय दखल

बाबू जॉन ने कहा:

“PM Narendra Modi की वैश्विक प्रतिष्ठा के चलते अगर भारत सरकार हूती सरकार से बात करे, तो परिणाम बदल सकते हैं।”

 निमिषा प्रिया आखिर यमन क्यों गई थी?

2008 में वर्क वीज़ा पर यमन गईं – आर्थिक तंगी में माता-पिता की मदद के लिए

अस्पतालों में काम करने के बाद खुद का क्लिनिक खोलने की कोशिश की

विदेशी नागरिकों को यमन में बिज़नेस खोलने के लिए लोकल पार्टनर जरूरी होता है

इसीलिए, उन्होंने तलाल अब्दो मेहदी को पार्टनर बनाया

मेहदी ने उनका पासपोर्ट ज़ब्त कर लिया, और उत्पीड़न शुरू कर दिया

2017 में उन्होंने नशे का इंजेक्शन देकर पासपोर्ट वापस लेने की कोशिश की, जिससे मेहदी की मौत हो गई एयरपोर्ट से गिरफ्तारी, और फिर मौत की सजा।