Delhi High Court's big decision: Patanjali's 'Fraudulent' Chyawanprash Ad will be removed within 72 hours.
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐसे मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसमें हरियाणा रोडवेज के एक बस कंडक्टर को ₹110 की धोखाधड़ी के आरोप में नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था। 20 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद अब जाकर उसे न्याय और मुआवजा मिला है।
1981 में नियुक्त, 2006 में लगे थे आरोप
इस बस कंडक्टर की नियुक्ति वर्ष 1981 में हरियाणा रोडवेज में हुई थी। लेकिन 4 जनवरी 2006 को उस पर पहली बार आरोप लगे कि उसने यात्रियों से पैसे लेकर टिकट नहीं दिए। इसके बाद कुल पांच अलग-अलग मामलों में ₹110 की Ticketless Recovery का आरोप लगा।
Inspector Report के आधार पर उसे बर्खास्त कर दिया गया और अनुशासनिक व अपीलीय प्राधिकरण ने उसके सभी सरकारी लाभों को भी रोक दिया था।
कोर्ट ने कहा: 110 रुपये की धोखाधड़ी पर 20 साल तक कानूनी लड़ाई, यह अन्याय है
जस्टिस प्रतीक जालान की एकल पीठ ने कहा कि यह मामला बेशक नियमों के मुताबिक दोबारा जांच के लिए भेजा जा सकता था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पास दशकों से चल रहे मामलों को “Judicial Discretion” के तहत खत्म करने का अधिकार है।
कोर्ट ने दो पुराने मामलों का हवाला देते हुए कहा कि जब किसी कर्मचारी ने 25 साल सेवा दी हो और बाद में केवल ₹110 के आरोप पर 20 साल तक कोर्ट के चक्कर काटे हों, तो यह उसके साथ न्याय नहीं बल्कि “Judicial Overburden” है।
हरियाणा रोडवेज को आदेश: रोकी गई Salary और Benefits तीन माह में लौटाएं
हाईकोर्ट ने हरियाणा रोडवेज को स्पष्ट आदेश दिया है कि कंडक्टर को रोक दी गई सैलरी, भत्ते और अन्य लाभ तीन माह के भीतर दिए जाएं।
इस फैसले से यह साफ हो गया है कि सिस्टम की निष्पक्षता तब ही साबित होती है जब छोटे कर्मचारियों को भी समान अधिकार और राहत मिले, भले ही मामला कितना ही छोटा क्यों न हो।
न्याय में देरी, पर इनकार नहीं
यह मामला न केवल एक मानवता से जुड़ा फैसला है, बल्कि उन हजारों कर्मचारियों के लिए भी उम्मीद की किरण है जो अनुशासनात्मक कार्रवाई के बाद वर्षों से न्याय का इंतजार कर रहे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला बताता है कि “Justice Delayed is Not Always Justice Denied”।