भारत में Muslim Personal Law की पैरवी, ब्रिटेन में Sharia Courts का विरोध? जानें पूरा मामला

UCC Debate in India: भारत में Uniform Civil Code (UCC) को लेकर ब्रिटिश मीडिया संस्थान The Economist की टिप्पणी ने एक नई बहस को जन्म दिया है। आरोप लगाया जा रहा है कि प्रकाशन भारत में समान नागरिक कानून को लेकर अलग रुख अपनाता है, जबकि ब्रिटेन में उसने धार्मिक आधार पर अलग कानूनी व्यवस्था को लेकर Secular Law की सर्वोच्चता का समर्थन किया था। इसी विरोधाभास को लेकर अब उसके Editorial Stand पर सवाल उठ रहे हैं।

भारत में UCC को लेकर The Economist की टिप्पणी

12 अगस्त को प्रकाशित एक लेख में The Economist ने सवाल उठाया कि क्या भारत में हर नागरिक को समान नियमों का पालन करना चाहिए। लेख में Uniform Civil Code और इसके प्रभावों को लेकर कई चिंताएं सामने रखी गईं।

लेख में असम, गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि अन्य राज्य भी UCC की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। इसमें खासतौर पर मुस्लिम समुदाय पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को रेखांकित किया गया और इसे धार्मिक स्वतंत्रता के संदर्भ में देखा गया।

लेख में BJP सरकारों पर आरोप लगाया गया कि समान नागरिक कानून के नाम पर धार्मिक अल्पसंख्यकों पर ऐसे नियम लागू किए जा रहे हैं, जिन्हें हिंदू समाज पहले से अपनाता आया है। हालांकि, UCC के समर्थकों का तर्क है कि इसका उद्देश्य किसी धर्म को निशाना बनाना नहीं, बल्कि Equality Before Law, Gender Justice और Equal Rights सुनिश्चित करना है।

मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर भी उठाया सवाल

The Economist के लेख में उत्तराखंड के UCC का उदाहरण देते हुए मुस्लिम महिलाओं के लिए समान विरासत अधिकार और बहुविवाह पर प्रतिबंध जैसे प्रावधानों का उल्लेख किया गया। साथ ही लेख ने Live-in Relationship Registration जैसी व्यवस्थाओं को लेकर भी सवाल उठाए।

दूसरी ओर, लेख में मुस्लिम Personal Law के कुछ प्रावधानों को महिलाओं के लिए लाभकारी बताया गया और Mehr जैसी व्यवस्था का उल्लेख किया गया। आलोचकों का कहना है कि इस तरह के विश्लेषण में मुस्लिम महिलाओं से जुड़े विवादास्पद सामाजिक और कानूनी मुद्दों पर पर्याप्त चर्चा नहीं की गई।

UCC के समर्थकों का तर्क है कि Uniform Civil Code का मूल उद्देश्य नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों को धर्म से अलग करते हुए एक समान कानूनी ढांचे के तहत लाना है। इसी वजह से इसे Gender Equality और Legal Uniformity से जोड़कर देखा जाता है।

हिंदू कानून पर टिप्पणी, लेकिन मौजूदा कानूनी सुधारों का भी संदर्भ जरूरी

लेख में हिंदू महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को लेकर भी टिप्पणी की गई और ऐतिहासिक रूप से महिलाओं को पैतृक संपत्ति में मिले सीमित अधिकारों का जिक्र किया गया। हालांकि, भारत में समय के साथ व्यक्तिगत कानूनों में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं।

विशेष रूप से Hindu Succession Act में किए गए संशोधनों ने बेटियों को संपत्ति के अधिकारों के मामले में महत्वपूर्ण कानूनी संरक्षण दिया है। इसलिए आलोचकों का कहना है कि भारतीय कानून की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए केवल ऐतिहासिक असमानताओं का उल्लेख पर्याप्त नहीं है।

2016 में The Economist का ब्रिटेन पर क्या था रुख?

विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा The Economist की नवंबर 2016 की एक पुरानी टिप्पणी से जुड़ा है। उस समय ब्रिटेन में Sharia Councils और मुस्लिम Family Law को लेकर चर्चा करते हुए प्रकाशन ने धार्मिक अदालतों के समानांतर कानूनी व्यवस्था बनने की संभावना पर चिंता जताई थी।

लेख में इस बात पर जोर दिया गया था कि ब्रिटेन में लागू Secular Law सर्वोच्च होना चाहिए और किसी धार्मिक व्यवस्था को देश की न्यायिक प्रणाली के समानांतर अधिकार नहीं मिलना चाहिए।

The Economist ने यह भी तर्क दिया था कि अलग-अलग धार्मिक कानूनों से नागरिकों के Legal Rights and Obligations में असमानता पैदा हो सकती है और इससे धार्मिक पहचान के आधार पर भेदभाव का खतरा बढ़ सकता है।

भारत और ब्रिटेन को लेकर ‘Double Standards’ का आरोप

यही पुराना रुख अब भारत में UCC पर The Economist की हालिया टिप्पणी के संदर्भ में चर्चा का केंद्र बन गया है। आलोचकों का सवाल है कि यदि ब्रिटेन में Secular Law को सर्वोच्च मानना जरूरी है, तो भारत में समान नागरिक कानून के प्रयास को उसी सिद्धांत से क्यों नहीं देखा जाना चाहिए?

भारत एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश है, जहां लंबे समय से Personal Laws vs Uniform Civil Code को लेकर बहस चलती रही है। UCC समर्थकों का कहना है कि नागरिकों के लिए कानून धर्म के आधार पर अलग नहीं होना चाहिए, जबकि विरोधियों का तर्क है कि व्यक्तिगत कानून धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े हैं।

UCC पर बहस सिर्फ राजनीति नहीं, कानून और अधिकारों से भी जुड़ी

Uniform Civil Code पर विवाद को केवल BJP बनाम विपक्ष की राजनीतिक बहस के तौर पर देखना इसके व्यापक कानूनी पहलू को सीमित कर सकता है। इसमें Constitutional Rights, Religious Freedom, Gender Justice, Equality Before Law और Personal Liberty जैसे कई मुद्दे शामिल हैं।

The Economist की टिप्पणी के बाद मुख्य सवाल यही है कि क्या अलग-अलग देशों के लिए कानून और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों को अलग-अलग नजरिए से देखा जाना चाहिए। आलोचकों का कहना है कि समानता और कानून की सर्वोच्चता के सिद्धांत किसी देश की राजनीतिक पसंद के अनुसार नहीं बदलने चाहिए।