Uttarkashi Devlang Festival: A unique tradition between fire and faith
उत्तराखंड के सीमांत जिले उत्तरकाशी में आयोजित Devlanga Fair (देवलांग मेला) इस बार भी अपनी अनूठी परंपराओं और सांस्कृतिक रंगों के कारण चर्चा में रहा। मेले में हजारों लोगों ने शिरकत की और स्थानीय संस्कृति का ऐसा रूप देखा, जो किसी भी पर्यटक या शोधकर्ता को रोमांचित कर सकता है।
ढोल-नगाड़ों के बीच शुरू हुआ मेला, तीन पट्टियों में दिखा उत्साह
बड़कोट क्षेत्र की बनाल पट्टी के गैर गांव, ठकराल पट्टी के गंगटाड़ी, और जबरी पट्टी के कुथनौर गांव में देवलांग मेला पारंपरिक तौर पर मनाया गया। ग्रामीणों ने ढोल-दमाऊ और नगाड़ों की थाप पर पूरी रात नृत्य कर मेले में रौनक भर दी।
ठकराल पट्टी के देवदार जंगल से एक विशाल देवदार वृक्ष लाकर इसे क्षेत्र के आराध्य रघुनाथ देवता के प्रांगण में खड़ा किया गया। लकड़ी के लंबे डंडों की सहायता से इस पेड़ को सीधा किया गया और बाद में इसमें आग प्रज्वलित की गई।
रातभर नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोक कलाकारों ने बांधा माहौल
देवलांग पेड़ के खड़े होते ही ग्रामीणों ने रातभर Raso Dance और Tandi Dance करते हुए पर्व का आनंद लिया।
बनाल और ठकराल पट्टी में लोक कलाकारों द्वारा रंगारंग कार्यक्रम आयोजित हुए, जबकि पुजारगांव धनारी में पारंपरिक सिद्धेश्वर देवलांग मेला पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
जलते पेड़ पर चढ़ते हैं युवक: मेले का सबसे रोमांचक आकर्षण
देवलांग मेले की सबसे अनूठी परंपरा वह रही, जिसमें युवा जलते हुए पेड़ पर चढ़ते हैं। देवदार के खड़े किए गए पेड़ के शीर्ष पर आग जलाई जाती है और युवक अपनी जान जोखिम में डालकर पेड़ पर चढ़ते हैं तथा जलती लकड़ियों के बीच से रस्सी निकालते हैं।
यह दृश्य इतना साहसिक होता है कि मेले का मुख्य आकर्षण बन जाता है। खास बात यह है कि अब तक इस परंपरा में कोई दुर्घटना या चोट की घटना दर्ज नहीं हुई, जिससे स्थानीय लोगों की आस्था और भी गहरी होती है।
पुजारगांव धनारी में तीन गांवों की रस्साकशी, रस्सी टूटने से मुकाबला बराबर
मेले के दौरान पुजारगांव, दड़माली और गवाणा के ग्रामीणों के बीच रस्साकशी की ऐतिहासिक प्रतियोगिता भी आयोजित हुई। तीन दिशाओं से रस्सियां बंधी थीं और सभी गांव अपनी-अपनी शक्ति से खींच रहे थे।
हालांकि, रस्सी टूटने के कारण यह रोमांचक मुकाबला बराबरी पर समाप्त हुआ। इसके बाद ग्रामीणों ने पेड़ को मंदिर प्रांगण के मध्य स्थापित कर उस पर घास डाली और आग जलाई।
सिद्धेश्वर देवता की विशेष पूजा, व्यापारिक स्टॉलों पर खूब खरीदारी
मेले के दौरान लगे स्थानीय व्यापारिक स्टॉलों पर ग्रामीणों ने खूब खरीदारी की। सिद्धेश्वर देवता मंदिर के पुजारी ने विशेष पूजा-अर्चना कर भक्तों को आशीर्वाद दिया।
इस बार नवनिर्मित सिद्धेश्वर मंदिर की भव्यता मेले का बड़ा आकर्षण बनी रही। पूरा परिसर रोशनी और संस्कृति के रंगों से जगमगा उठा।
देवलांग की अनोखी पहचान: चीड़ के पेड़, आग और परंपरा का संगम
मेले की असली पहचान एक लंबे चीड़ के पेड़ से जुड़ी है, जिसे मंदिर के प्रांगण में खड़ा किया जाता है। बाद में जलती लकड़ियों के बीच से रस्सी निकालने की परंपरा निभाई जाती है, जिसे ग्रामीण “साहस और आस्था का संगम” मानते हैं।
यह नजारा वहाँ मौजूद हर व्यक्ति को रोमांचित कर देता है। रस्साकशी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद ग्रामीण उत्सव की खुशी के साथ अपने घर लौट जाते हैं।