वक्फ बिल पर लोकसभा में शायरी और कविता की गूंज

क्या हुआ जब संसद में बहस के दौरान शेरो-शायरी ने बांधा समा?

लोकसभा में बुधवार को वक्फ (Waqf Bill) संशोधन विधेयक पर बहस के दौरान माहौल कुछ अलग ही नजर आया। गंभीर मुद्दों पर चर्चा के बीच कविता और शेरो-शायरी का दौर चला, जिसने सदन को वाह-वाह करने पर मजबूर कर दिया।

शेरो-शायरी ने बदली बहस की फिजा

बिल पेश करते हुए केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा, “किसी ने कहा कि ये प्रावधान गैर-संवैधानिक हैं, किसी ने कहा कि गैर-कानूनी हैं। यह कोई नया विषय नहीं है। 1923 में मुस्लिम वक्फ एक्ट (Muslim Waqf Act) लाया गया था, जिसमें ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी का आधार दिया गया था।” इस दौरान उन्होंने शेर पढ़ा, जिसका असर पूरे सदन पर साफ दिखा।

“तू हिंदू बनेगा, न मुसलमान बनेगा”

टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा, “ममता बनर्जी के नेतृत्व में, अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) इस बिल का पूरी तरह विरोध करती है।” उन्होंने अपना भाषण प्रसिद्ध पंक्तियों के साथ समाप्त किया, “तू हिंदू बनेगा, न मुसलमान बनेगा; इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा।”

भाजपा सांसद सांबित पात्रा का शेर और कविता

भाजपा सांसद सांबित पात्रा ने बहस के दौरान एक प्रभावशाली शेर पढ़ा, “उसी का शहर, वही मुद्दई, वही मुंशिफ, हमें यकीन था हमारा कसूर जरूर निकलेगा।” इसके अलावा उन्होंने गया प्रसाद शुक्ल ‘स्नेही’ की कविता से पंक्तियाँ भी प्रस्तुत की: “किसी को बनाया नहीं दास, किसी का किया नहीं उपहास, किसी का छीना नहीं निवास, किसी को दिया नहीं त्रास।”

“ईद के जायके को कड़वा करना”

सपा सांसद इकरा हसन ने वक्फ बिल का विरोध करते हुए सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “दान देने के लिए प्रैक्टिसिंग मुस्लिम (Practicing Muslim) का क्लॉज है, लेकिन बोर्ड में शामिल होने के लिए यह जरूरी नहीं है। ये बिल मुसलमानों की भलाई के लिए नहीं, बल्कि उन्हें मिटाने के लिए है।”

“बाबासाहब का संविधान चलेगा, मुगलिया फरमान नहीं”

भाजपा नेता अनुराग ठाकुर ने कहा, “यह हिंदुस्तान है, पाकिस्तान या तालिबान नहीं। यहां बाबा साहब का संविधान (Baba Saheb’s Constitution) चलेगा, किसी कबीले का फरमान नहीं।” इस बयान पर सदन में जोरदार मेज थपथपाई गई।

 

वक्फ बिल (Waqf Bill) पर बहस के दौरान शायरी और कविताओं ने चर्चा को दिलचस्प बना दिया। मुद्दे गंभीर थे, पर हल्की-फुल्की अंदाज में भी राजनीतिक तंज कसे गए। यह बहस लोकसभा की उन चर्चाओं में से रही, जिसमें शब्दों के खेल ने माहौल को अलग ही रंग दिया।