Homebound Review: A film about friendship, racism, and the tragedy of Covid that will shake you to your core
Homebound (2025) सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ का आईना है। दोस्ती, जातिवाद (casteism in India), धार्मिक उन्माद, गरीबी और कोविड त्रासदी—यह फिल्म हर उस पहलू को छूती है जिसे समाज अक्सर नजरअंदाज कर देता है।
फेस्टिवल सर्किट (Cannes Film Festival, Oscar Entry) में तालियां और अवॉर्ड्स बटोरने वाली यह फिल्म दर्शकों को गहरे सवालों के कटघरे में खड़ा करती है। लेकिन चेतावनी यही है—यह फिल्म आसान नहीं है। धीमी रफ्तार वाली यह कहानी आपको भीतर तक हिला देती है और संवेदनशील दर्शकों को डिप्रेशन-सा एहसास भी करवा सकती है।
कहानी – दोस्ती से कोविड त्रासदी तक
उत्तर भारत के गांव से शुरू होती है कहानी। Shoeb (Ishan Khattar) और Chandan Kumar Valmiki (Vishal Jethwa)—दो बचपन के दोस्त, जिनका सपना है पुलिस भर्ती परीक्षा पास करके वर्दी पहनना।
लेकिन हकीकत अलग है। 3,500 पदों के लिए 25 लाख बेरोजगार आवेदन करते हैं। परीक्षा देना किसी युद्ध से कम नहीं। एक युवा दलित, दूसरा अल्पसंख्यक—दोनों सम्मान और रोज़गार की तलाश में जूझते रहते हैं।
Interval तक फिल्म समाज के अन्याय और जातिवाद की परतें खोलती है। इसके बाद Covid-19 pandemic में सूरत में फंसे इन मजदूर युवाओं की त्रासदी दिखती है। लॉकडाउन के दौरान भूखे-प्यासे, नंगे पांव घर लौटते प्रवासी मजदूरों की दर्दनाक सच्चाई कैमरे में कैद होती है।
दमदार डायलॉग्स
“लोग सरनेम पूछते हैं। बताते हैं तो लोग दूर हो जाते हैं, नहीं बताते हैं तो अपने आप से दूर हो जाते हैं।”
“जात नहीं छोड़ती भाई। तू कितना भी भाग ले, वो पीछे-पीछे आती है।”
“लॉकडाउन ने सबको घर भेजा, पर हमारा घर तो कहीं है ही नहीं।”
ये लाइनें फिल्म को महज़ सिनेमा नहीं, बल्कि समाज का दस्तावेज़ बना देती हैं।
एक्टिंग और टेक्निकल पहलू
Ishan Khattar और Vishal Jethwa की जोड़ी स्क्रीन पर बेहद असली लगती है।
Vishal का चंदन दिल दहला देने वाला किरदार है—आंखों में दर्द और संघर्ष साफ झलकता है।
Janhvi Kapoor का छोटा लेकिन असरदार रोल, वहीं Sudipta Bhattacharya और Harshika Parmar ने अपने किरदारों से गहरी छाप छोड़ी।
फिल्म की शूटिंग Sehore (Madhya Pradesh) और Bhopal University में हुई है। Cinematographer Prateek Shah ने गांवों की कड़वी हकीकत—कीचड़, खाली सड़कें और गरीबी—को बेहद संवेदनशील तरीके से कैद किया है। बैकग्राउंड म्यूजिक और एडिटिंग कहानी को और मजबूत बनाते हैं।
Verdict – सिर्फ बहादुर दर्शकों के लिए
Homebound हर उस दर्शक के लिए है जो समाज का कड़वा सच देखना चाहता है। यह सिर्फ एक festival movie नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक-आर्थिक यथार्थ का गहन चित्रण है।
Warning: अगर आप सच्चाई देखने का साहस रखते हैं, तभी यह फिल्म देखें।