22 साल की शादी का हवाला भी नहीं आया काम, हाईकोर्ट ने खारिज की गिरधारी साहू की याचिका

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या और उनके पति गिरधारी लाल साहू से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने गिरधारी लाल साहू की ओर से दायर रिट याचिका खारिज करते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया। यह एफआईआर देहरादून के कैंट थाना क्षेत्र में दर्ज कराई गई थी। याचिका में साहू ने मुकदमे को निरस्त करने की मांग की थी।

गिरधारी लाल साहू ने हाईकोर्ट में दी थी चुनौती

गिरधारी लाल साहू ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। रेखा आर्या की शिकायत पर उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी, 323, 420, 467, 468, 471, 495, 498-ए, 504 और 506 के साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि दोनों पक्षों की शादी 6 जुलाई 2004 को हुई थी और वे करीब 22 वर्षों से साथ रह रहे हैं। बचाव पक्ष का कहना था कि यह मामला मूल रूप से घरेलू विवाद का है, जिसे अब आपराधिक मामला बनाया जा रहा है।

रेखा आर्या ने लगाए मारपीट और धोखाधड़ी के आरोप

रेखा आर्या ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि शादी के समय गिरधारी लाल साहू ने अपनी पहली शादी और बच्चों की जानकारी उनसे छिपाई थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि साहू के अन्य महिलाओं से संबंध थे। इसका विरोध करने पर उनके साथ मारपीट की गई, गाली-गलौज हुई और जातिसूचक अपमानजनक टिप्पणियां की गईं।

शिकायत में कंपनी के निदेशक पद से हटाने का मामला भी उठाया गया। आरोप है कि गिरधारी लाल साहू ने कथित तौर पर फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेज तैयार कर उन्हें जबरन पद से सेवानिवृत्त दिखा दिया, जबकि उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया था।

ऑडियो रिकॉर्डिंग में हत्या की साजिश का आरोप

रेखा आर्या की शिकायत में एक ऑडियो रिकॉर्डिंग का भी उल्लेख किया गया है। आरोप है कि इसमें गिरधारी लाल साहू की ओर से उन्हें रास्ते से हटाने और इसके लिए पैसे खर्च करने की बात सामने आई थी। राज्य सरकार और रेखा आर्या की ओर से पेश वकीलों ने इन आरोपों का हवाला देते हुए याचिका का विरोध किया। उन्होंने यह भी दलील दी कि याचिकाकर्ता जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं।

हाईकोर्ट ने कहा- आरोप सामान्य वैवाहिक विवाद तक सीमित नहीं

न्यायमूर्ति आलोक महरा की अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद कहा कि मामले में लगाए गए आरोप केवल सामान्य वैवाहिक मनमुटाव तक सीमित नहीं हैं। अदालत के अनुसार, प्रथम दृष्टया इसमें शारीरिक प्रताड़ना, दस्तावेजों की कूट रचना, जातिसूचक अपमान और जान से मारने की साजिश जैसे गंभीर संज्ञेय अपराधों के आरोप शामिल हैं।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शादी को करीब 22 वर्ष बीत जाने का तथ्य बाद में कथित तौर पर हुए अपराधों या क्रूरता की संभावना को खारिज करने का आधार नहीं हो सकता। ऑडियो रिकॉर्डिंग और कथित फर्जी दस्तावेजों की वास्तविकता की जांच और विचारण के दौरान ही परखी जा सकती है।

FIR रद्द करने का नहीं मिला आधार

हाईकोर्ट ने माना कि इस स्तर पर एफआईआर को रद्द करने का कोई उचित आधार नहीं बनता। इसके साथ ही अदालत ने गिरधारी लाल साहू की रिट याचिका खारिज कर दी। इस फैसले के बाद उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर बरकरार रहेगी और मामले की जांच आगे जारी रह सकेगी।