भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर सहयोग: ऐतिहासिक करार की पूरी कहानी
भारत और अमेरिका के बीच सिविल न्यूक्लियर सहयोग की नींव 2005 में रखी गई थी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार को राजनीतिक संकट में डालकर इस समझौते को आगे बढ़ाया। यह करार भारत के ऊर्जा क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाने की दिशा में एक बड़ा कदम था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में यह करार एक नई ऊंचाई पर पहुंचा। अमेरिकी ऊर्जा विभाग (DoE) ने एक अमेरिकी कंपनी को भारत में न्यूक्लियर एनर्जी रिएक्टर को संयुक्त रूप से डिजाइन और निर्माण करने की अनुमति दे दी है। यह परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में दोनों देशों के बीच एक ऐतिहासिक सहयोग का प्रतीक है।
समझौते के मुख्य बिंदु
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परमाणु ऊर्जा में सहयोग: भारत को अमेरिका से परमाणु ईंधन और उन्नत तकनीक मिलेगी, जिससे बिजली उत्पादन बढ़ेगा।
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परमाणु परीक्षण की शर्तें: भारत इस समझौते के तहत परमाणु परीक्षण नहीं करेगा, अन्यथा सहयोग समाप्त हो जाएगा।
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IAEA निगरानी: भारत के असैन्य परमाणु संयंत्रों की निगरानी अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) करेगी।
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NSG से विशेष छूट: परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) से छूट मिलने के बाद भारत को परमाणु व्यापार की अनुमति मिली।
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भारत की संप्रभुता बरकरार: इस समझौते के बावजूद, भारत अपने सामरिक परमाणु कार्यक्रम को स्वतंत्र रूप से चला सकता है।
मनमोहन सिंह का साहसी कदम और मोदी का विजन
2005 में, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी गठबंधन सरकार को जोखिम में डालकर इस समझौते को आगे बढ़ाया। वामपंथी दलों ने कड़ा विरोध किया और सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी दी। इसके बावजूद, मनमोहन सिंह अपने फैसले पर अडिग रहे और भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर डील 2007 में हस्ताक्षरित हुई।
वर्तमान में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को नई ऊंचाई तक पहुंचाया है। अमेरिकी कंपनियां अब भारत में छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) का निर्माण करेंगी, जिससे ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।
भारत-अमेरिका न्यूक्लियर डील का महत्व
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स्वच्छ ऊर्जा के बड़े स्रोत से बिजली संकट में कमी आएगी।
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अमेरिका-भारत संबंधों में नई मजबूती आएगी।
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अन्य देशों के साथ भी परमाणु ऊर्जा सहयोग के द्वार खुलेंगे।