Raksha Bandhan Special: उत्तराखंड में राखी के दिन होता है ‘पत्थर युद्ध’, जानें देवीधुरा की बग्वाल की अनोखी कहानी

Raksha Bandhan 2026: रक्षाबंधन का त्योहार आमतौर पर भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और रक्षा के संकल्प से जुड़ा है। लेकिन उत्तराखंड के चंपावत जिले में इसी दिन एक ऐसी सदियों पुरानी परंपरा निभाई जाती है, जिसे देखकर पहली नजर में यकीन करना मुश्किल हो सकता है। यहां रक्षाबंधन के दिन चार खामों के लोग एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। इस अनोखी परंपरा को ‘बग्वाल’ या ‘Stone War’ के नाम से जाना जाता है।

रक्षाबंधन पर युद्ध का मैदान बन जाता है मंदिर परिसर

चंपावत जिले के देवीधुरा स्थित मां वाराही धाम में रक्षाबंधन के अवसर पर बग्वाल का आयोजन होता है। मान्यता है कि सालभर शांत रहने वाला मंदिर परिसर इस दिन कुछ समय के लिए युद्ध के मैदान जैसा नजर आने लगता है।

कुमाऊं क्षेत्र में इस आयोजन को ‘अषाढ़ी कौतिक’ के नाम से भी जाना जाता है। रक्षाबंधन के दिन पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद चार खामों के लोग परंपरागत रूप से आमने-सामने आते हैं और एक-दूसरे की ओर पत्थर फेंकते हैं।

हाथों में होती है ‘फर्रा’ नाम की ढाल

बग्वाल में शामिल लोग खुद को पत्थरों से बचाने के लिए लकड़ी की पारंपरिक ढाल का इस्तेमाल करते हैं, जिसे ‘फर्रा’ कहा जाता है। आयोजन की शुरुआत मां वाराही के जयकारों और मंदिर की परिक्रमा से होती है।

इसके बाद सभी की नजरें मंदिर के पुजारी की ओर रहती हैं। परंपरा के अनुसार पुजारी के संकेत के बाद ही पत्थर युद्ध शुरू होता है। कुछ समय तक दोनों पक्षों की ओर से पत्थर फेंके जाते हैं और वातावरण में जयकारों के साथ लोगों की आवाजाही बनी रहती है।

पुरानी दुश्मनी नहीं, धार्मिक मान्यता से जुड़ी है परंपरा

बाहर से देखने पर यह आयोजन किसी संघर्ष या पुरानी दुश्मनी जैसा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे ऐसी कोई वजह नहीं बताई जाती। Bagwal Festival को धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी लोक मान्यता से जोड़कर देखा जाता है।

मान्यता है कि इस परंपरा के पीछे मां वाराही से जुड़ी एक प्राचीन कथा है।

नरबलि की परंपरा से जुड़ी है बग्वाल की कहानी

स्थानीय पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन समय में मां वाराही को प्रसन्न करने के लिए चारों खामों की ओर से बारी-बारी से परिवार के एक व्यक्ति की बलि देने की परंपरा थी।

कहानी के मुताबिक एक बार चम्याल खाम के एक परिवार की बलि देने की बारी आई। परिवार में एक बुजुर्ग महिला और उसका इकलौता पोता था। पोते की बलि का मतलब था कि महिला का वंश समाप्त हो जाना।

कहा जाता है कि बुजुर्ग महिला ने मां वाराही के सामने अपने पोते की जिंदगी की गुहार लगाई। लोककथा के अनुसार, मां वाराही ने उसे सपने में दर्शन देकर नरबलि की परंपरा समाप्त करने का आश्वासन दिया।

देवी ने दिया पत्थर युद्ध का आदेश!

लोक मान्यता के मुताबिक देवी ने कहा कि अब नरबलि नहीं होगी, लेकिन इसके स्थान पर चारों खामों के लोग आपस में बग्वाल खेलेंगे। यह आयोजन तब तक चलेगा, जब तक एक व्यक्ति के शरीर के बराबर रक्त न बह जाए।

इसी मान्यता को Bagwal Stone War Tradition की शुरुआत से जोड़ा जाता है। परंपरा के अनुसार जब निर्धारित सीमा तक रक्त बहने की स्थिति बनती है तो पुजारी के संकेत के बाद बग्वाल रोक दी जाती है।

युद्ध खत्म होते ही गले मिलते हैं लोग

बग्वाल की सबसे दिलचस्प बात यह है कि आयोजन के दौरान लोग एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं, लेकिन इसके खत्म होने के बाद माहौल पूरी तरह बदल जाता है। दोनों पक्षों के लोग आपस में मिलते हैं, एक-दूसरे का हालचाल पूछते हैं और भाईचारे का संदेश देते हैं।

यानी यह आयोजन किसी व्यक्तिगत दुश्मनी या जीत-हार के लिए नहीं बल्कि धार्मिक परंपरा और आस्था से जुड़ा माना जाता है।

2013 में पत्थरों के इस्तेमाल पर लगी रोक

बग्वाल को लेकर सुरक्षा और चोट की आशंका के कारण वर्ष 2013 में नैनीताल हाईकोर्ट ने पत्थरों के इस्तेमाल पर रोक लगाने का आदेश दिया था। इसके बाद आयोजन में पत्थरों की जगह फल और फूलों का इस्तेमाल किए जाने की परंपरा सामने आई।

देवीधुरा की Bagwal Tradition आज भी उत्तराखंड की अनोखी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में गिनी जाती है। रक्षाबंधन के दिन होने वाला यह आयोजन स्थानीय आस्था, लोककथा और सदियों पुरानी परंपरा का अनोखा मेल है।